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नागनथैया की लीला: आधी हो गई पास की संख्या, इस बार 800 ही जारी; तुलसी घाट पर यमुना का रूप धरेंगी गंगा

Sat, 25 Oct 2025 03:14 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: काशी के तुलसी घाट पर सैकड़ों लोगों की भीड़ विश्व प्रसिद्ध नाग नथैया देखने के लिए उमड़ पड़ी है। इस बार कम पास जारी हुए थे। गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी और घाट पर जमी सिल्ट के कारण लीला स्थल सिमट गया है।
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नागनथैया की लीला। सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Nag Nathaiya Varanasi 2025: गोस्वामी तुलसीदास की 500 साल पुरानी श्रीकृष्ण लीला की परंपरा उत्तरवाहिनी के तट पर नागनथैया के रूप में जीवंत होगी। गंगा यमुना का रूप धरेंगी और कन्हैया कालिया नाग को नथेंगे। 

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गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी और घाट पर जमी सिल्ट के कारण लीला स्थल सिमट गया है। इस वजह से पास धारकों की संख्या आधी हो गई है। हर साल जहां 1500 पास जारी होते थे। इस बार 700-800 पास ही जारी किए गए हैं।

अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास की ओर से होने वाली काशी की सुप्रसिद्ध नागनथैया लीला (कालियदमन) शनिवार को तुलसी घाट पर होगी। लीला अपराह्न तीन बजे शुरू होगी और भगवान श्रीकृष्ण शाम 4:40 बजे कदंब के पेड़ से कूदेंगे और कालिया नाग को नथकर उसके फन पर विराजमान नृत्य मुद्रा में वेणु वादन करते हुए जल से बाहर होकर श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे। 

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लीला स्थल पर बाढ़ के कारण जगह कम होने से पासधारकों की संख्या को कम कर दिया गया है। तुलसीघाट से महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग बैरिकेडिंग की गई है। दिन में दो बजे ही रीवा घाट से प्रवेश बंद कर दिया जाएगा। सुरक्षा के लिए 400 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है।
 
संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास की ओर से शुरू की गई यह लीला काशी के लक्खा मेलों में शुमार है। लीला की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। बाढ़ के कारण घाट पर जगह थोड़ी कम है। शनिवार की सुबह कदंब का वृक्ष संकटमोचन मंदिर से लाकर लगाया जाएगा।
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1553 में अकबर आया था 500 पुरानी लीला देखने 
नागनथैया की लीला का आकर्षण ऐसा था कि 1553 में सम्राट अकबर भी इस लीला को देखने काशी आया था। काशी नरेश का परिवार बजड़े पर सवार होकर हर साल लीला में शामिल होता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भदैनी में करीब 500 साल पहले कार्तिक माह में श्रीकृष्ण लीला की शुरुआत की थी। 22 दिनों की लीला की परंपरा आज भी जारी है। इसमें भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव, पूतना वध, कंस वध, गोवर्धन पर्वत सहित कई लीलाएं होती हैं। 

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