मुन्ना बजरंगी की मौत ही उसे वाराणसी से बागपत ले गई। दरअसल, सोमवार को बनारस में एडीजे चतुर्थ मोहम्मद गुलाम उल मदार की अदालत में 1995 के कैंट क्षेत्र के चर्चित छोटे सिंह-बड़े सिंह हत्याकांड के मामले में बजरंगी को पेश होना था।
मगर, बजरंगी को यहां पेश न कराकर उसे बागपत में न्यायालय में विचाराधीन मामले में पेश कराने के लिए ले जाया गया। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के लिए 17 जुलाई की तिथि नियत कर दी है।
लगभग 23 साल पुराने मामले के प्रति उपेक्षा और नए मामले के प्रति पुलिस की गंभीरता पर कचहरी में अधिवक्ताओं के बीच तरह-तरह की चर्चा होती रही। एडीजे चतुर्थ की अदालत में मई में बजरंगी के अधिवक्ताओं ने उसकी ओर से आवेदन देकर जान की सुरक्षा की गुहार लगाई थी।
कहा गया था कि वह झांसी जेल में निरुद्ध है और उसकी हत्या की साजिश रची गई है। नौ मार्च को एसटीएफ के दो लोग झांसी जेल में आए। इस दौरान जेल में अन्य कैदियों के साथ साजिश रच कर बजरंगी के खाने में जहर मिलाने या फिर अन्य तरीके से हत्या करने की बात तय की गई।
एसटीएफ के दोनों लोगों ने बंदी कमलेश से बजरंगी की हत्या की बात तय की। इसके बाद एक मई को एएसपी झांसी जेल में एक डॉक्टर को लेकर आए और जबरन बजरंगी के स्वस्थ होने का सर्टिफिकेट बनवाए।
बजरंगी के अधिवक्ताओं का कहना था कि एसटीएफ के लोगों और एएसपी झांसी का आना-जाना जेल में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद है। अदालत ने इस पर संज्ञान लेते हुए कारागार प्रशासन के महानिरीक्षक को पत्र लिखा था। पत्र पर कार्रवाई से पहले ही बजरंगी की हत्या कर दी गई।