वाराणसी। ऐ अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया, मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया...। मां तो बस मां होती है। उसका तो धर्म और मजहब सिर्फ और सिर्फ ममता होती है। हम बात कर रहे हैं ऐसी ही एक मां और उनकी मुंहबोली बेटी की। सीएचएस में उर्दू की अध्यापिका डॉ. शबनम खातून का कहना है कि 2008 में जब वह बतौर अध्यापक नियुक्त हुई थीं तो सोचा नहीं था कि उन्हें एक और मां डॉ. स्मिता भटनागर के रूप में मिल जाएंगी।
विद्यालय में औपचारिकता के साथ शुरू हुआ यह रिश्ता ना जाने कब मां-बेटी की डोर में बंध गया। मेरे परिवार में मां, बाप, भाई और बहन हैं लेकिन स्मिता मां के रूप में मुझे तो जैसे यशोदा मां मिलीं। हर फैसले में और हर कदम पर उन्होंने मां की तरह साथ दिया। होली हो चाहे ईद उन्होंने हर मौके पर मां का फर्ज निभाया। इसमें ना कभी धर्म और ना ही मजहब की दीवारें आड़े आईं। 2009 में जब मां को कैंसर होने का पता चला तो इसके बाद मेरी बेटी होने की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। मां तो अपने परिवार में केवल अपनी 87 साल की मां के साथ ही रहती हैं और बाकी उनकी बहनें दूसरे शहरों में। कैंसर की इस लड़ाई में शुरुआती दौर से लेकर आपरेशन तक के सफर में मैंने उनका साथ दिया। मैंने यह ठान लिया था कि मां को कमजोर नहीं होने देना है। आज 11 साल बीत चुके हैं और मां एकदम स्वस्थ हैं।