वाराणसी। हवा दुखों की जब आई कभी खिजां की तरह, मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी मां की तरह...। जी हां, मां ऐसी ही होती है। अपनी औलाद पर कोई मुश्किल आने ही नहीं देती। फिर चाहे मुश्किलों की राह में उसे खुद ही क्यों न चलना पड़े। मातृ दिवस पर हम ऐसी ही माताओं को नमन कर रहे हैं जो अकेले दम पर अपने बच्चों की जिंदगी सवार रही हैं। ये माताएं कांटों भरी राह पर खुद चली लेकिन बच्चों को इसका अहसास तक नहीं होने दिया।
मां तू ही है जिसने मुझे रोते हुए हंसाया था
पहले पत्नी अब मां के तौर पर सरिता सिंह की जिंदगी से जंग भरी है। उम्र से पहले ही इस मां के चेहरे पर झुर्रियां आ गईं, जो उनकी कहानी बयां करने को काफी हैं। पति जितेंद्र सिंह को जिंदगी और मौत की जद्दोजहद से ना निकाल पाने की कसक तो जिंदगी भर के लिए है ही, दो बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी और उनके सपने को पूरा करना अब जिद है। 12 साल पहले पति का साथ छूटा तो बेटा छह साल का बेटी चार साल की थी। घर की बड़ी बहू की जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने विद्यापीठ के मंदित बाल विद्यालय में क्लर्क की नौकरी की। सुबह उठकर घर का काम और बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर के सरिता जौनपुर से काशी विद्यापीठ नौकरी करने आती है। मंदित बाल विद्यालय में नौकरी के दौरान विद्यालय की हेड डॉ. अनिता सिंह ने सरिता का हौसला बढ़ाया। क्लर्क के बाद सरिता जूनियर असिस्टेंट बनी लेकिन प्रमोशन के लिए उनको शिक्षित होना जरूरी था। तब सरिता ने स्नातक करने का फैसला किया। नौकरी के साथ साल 2014 में स्नातक पास कर वो अब सीनियर असिस्टेंट पद पर कार्यरत हैं। आज अपने बच्चों शिवेंद्र व साक्षी के लिए सरिता मां व पिता दोनों ही है। बच्चे अपनी मां को अपनी ताकत मानते हैं, जिसने उन्हें रोते हुए हंसाया है।
मां की मेहनत से बेटा बन गया कामयाब
सिगरा निवासी शुभी नाज का संघर्ष एक मां के तौर पर काबिलेतारीफ है। पति से अलग होने के बाद अपने बेटे की जिम्मेदारी ही नहीं संभाली बल्कि एक दोस्त बनकर उसकी जरूरतों और भावनाओं को समझा। दो साल की उम्र में खुद पिता का साया खोने वाली शुभी ने अपने बेटे को कभी पिता की कमी महसूस होने दी। बेटू से स्नातक करने के बाद उनकी शादी हुई और 1996 में उन्हें बेटा पैदा हुआ। बेटे के जन्म के बाद ही उनका तलाक हो गया। पति से अलग होने के बाद उन्होंने बेटे की परवरिश बेहतर ढंग से करने के लिए फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई की, खुद को अपने पैरों पर खड़ा किया। बेटे को बेहतर भविष्य और तालीम देने के लिए शुभी ने अपनी तकलीफों को भुला दिया। शुभी के त्याग की बदौलत ही उनका बेटा आईसीएमआर मुंबई में डॉक्टर के पद पर कार्यरत हैं। वहीं एक छोटे से दुकान से काम शुरू करने वाली शुभी आज खुद एक बुटिक की मालिक है।
इतिहास
मदर्स डे मनाने की शुरुआत 18 मई 1914 को अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने जॉइंट रिजोल्यूशन पर हस्ताक्षर करके की थी। तभी से हर साल मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है।