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Mothers Day 2022: इन माताओं के हौसले और जज्बे की दास्तान जिन्हें पढ़कर आप भी करेंगे सलाम

Sun, 08 May 2022 12:24 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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मदर्स डे विशेष - फोटो : अमर उजाला
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चलती फिरती हुई आंखों से अजां देखी है, मैंने जन्नत तो नहीं देखी है मां देखी है। मां को समर्पित शायर मुनव्वर राणा की लाइनें मां की अहमियत को बखूबी दर्शाती हैं। ‘मां’ एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही ममता, संवेदना, हिम्मत, हौसला और भी न जाने भावनाओं के कितने रंग एक साथ आंखों के सामने तैर जाते हैं। इंसान ने जब से जीवन की शुरुआत की, मां की ममता की छांव और उसकी दुआओं की ढाल ने हर कदम पर आगे बढ़ने का हौसला दिया। आज ‘मदर्स डे’ के खास दिन के लिए हम लाए हैं ऐसी माताओं के हौसले और जज्बे की दास्तान जिन्हें पढ़कर आप भी करेंगे इन्हें सलाम...

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बेटे के सपनों के लिए तोड़ दी परंपराओं की बेड़ियां
ओबरा के एक गांव में ब्याही चंद्रकला रावत अपने दिव्यांग बेटे रुद्राक्ष के लिए ससुराल छोड़कर वाराणसी चली आईं। आज वे अपने फैसले से संतुष्ट हैं। बेटे को तो सही दिशा मिली ही, चंद्रकला उसके जैसे कई बच्चों की एजुकेटर बनकर उनका जीवन भी संवार रही हैं।

परिवार के संग चंद्रकला रावत - फोटो : अमर उजाला
चंद्रकला ने जब बेटे को जन्म दिया तो उन्हें नहीं पता था कि उनका बेटा दिव्यांग है। जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा उसकी शारीरिक अक्षमताएं देख वह चिंतित हो उठीं। परिवार वालों को बिना बताए बेटे को लेकर वे डॉक्टर के पास गईं तो पता चला कि वह दिव्यांग है।

बनारस आने के बाद बच्चों को लेकर वह कमच्छा में डॉ. तुलसी के मिलीं। उन्होंने बच्चे को विशिष्ट बच्चों के स्कूल में भर्ती कराया। वहां अपने बेटे जैसे कई और मासूमों को देखा। तभी चंद्रकला ने ठान लिया कि वह यहीं रहकर बच्चों को पढ़ाएंगी और उन्हें दूसरों के बराबर खड़े होने में पूरी मदद करेंगी। आज चंद्रकला के हौसले की बदौलत उनका 14 साल बेटा वॉक रेस में नेशनल प्लेयर है। 

बेटे की लगी रहती है चिंता

खंड विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत रक्षिता सिंह - फोटो : अमर उजाला
काशी विद्यापीठ ब्लॉक में खंड विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत रक्षिता सिंह एक अधिकारी होने के साथ एक मां की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही हैं। सुबह कार्यालय आने के लिए वो बेटे को दादी के पास छोड़कर ड्यूटी पर आती हैं। कोरोना काल में कई बार ऐसे हालत हुए जब मां और बेटे को एक दूसरे को देखे कई दिन बीत जाते थे।

रक्षिता उस समय को याद करते हुए बताती हैं कि कोरोना के पहली लहर के दौरान बेटा छोटा था। ड्यूटी के चलते घर से भोर में निकलना पड़ता था, जब बेटा सोया रहता था। कभी-कभी ड्यूटी देर तक होती थी, जिससे घर आने में रात हो जाती थी, तो बेटा सो जाता था।

जिससे कई दिन ऐसे भी आए कि बेटे को गले भी नहीं लगा पाते थे। कई बार ड्यूटी के लिए निकलने के दौरान बेटा मुझे जाने नहीं देता, ऐसे समय में उसको समझना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। व्यस्तता के चलते बच्चे को पूरा समय न दे पाने का मलाल भी रहता है। लेकिन वो अपनी दोनों जिम्मेदारियां बखूबी निभाती हैं। 

सिलाई-कढ़ाई कर बेटी को बनाया अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

विमला पांडेय - फोटो : अमर उजाला
अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर बनने के बेटी के सपनों में रंग भरने के लिए जो हौसला विमला पांडेय ने दिखाया, वह सिर्फ मां ही कर सकती है। बेटी के खिलाड़ी बनने के सपने के लिए विमला ने इधर-उधर ठोकरें खाईं। आखिरकार विमला ने सिलाई करके बेटी के सपने को पूरा करने की ठानी, मां की मेहनत रंग लाई।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में पदकों की झड़ी लगाते हुए बिटिया अंतरराष्ट्रीय वेटलिफ्टर बन गई। गाय घाट की संकरी गलियाें में किराए के एक कमरे में पूर्णिमा और उनके मां के संघर्ष की पूरी कहानी बयां करती है। साल 2019 में जब पूर्णिमा के पिता की मृत्यु हुई तो विमला के सामने घर के साथ बेटी के सपने को पूरा करने की चुनौती खड़ी हो गई। लेकिन मां ने हार नहीं मानी, आसपास के लोगों के कपड़े सिलकर बेटी की हर जरूरत को पूरा किया आज वो बेटी मां के संघर्षों को सफल बना रही है। 

खाकी के फर्ज के साथ मां की जिम्मेदारी

लोहता थाने में तैनात सिपाही कृष्णा - फोटो : अमर उजाला
एक तरफ घर में बच्चों और मां-बाप का ख्याल रखना है तो दूसरी तरफ खाकी का फर्ज निभाना है, महिला पुलिसकर्मी दोनों ही जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं। लोहता थाने में तैनात सिपाही कृष्णा की बेटी अभी 11 महीने की है। बेटी को देवर के साथ छोड़ कृष्णा ड्यूटी पर आती हैं।

कृष्णा की पुलिस विभाग में पोस्टिंग साल 2016 में हुई थी, इसके बाद पहले वो कपसेठी थाने में तैनात थी, कोरोना काल में उनकी ड्यूटी काशी विश्वनाथ मंदिर में थी। इस दौरान यहां आने वाले भक्तों को वो कोरोना गाइडलाइन के बारे में भी जागरूक कर रही थी।  मूलत: प्रतापगढ़ निवासी कृष्णा के पति भी पुलिस विभाग में है। कृष्णा बताती है कि ड्यूटी के दौरान बेटी के साथ कम वक्त मिल पाता है, लेकिन मुझे गर्व है कि मां के साथ अपनी वर्दी का फर्ज निभा रही हूं। 
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बंधनों को तोड़ बच्चों के साथ सीखा कराते

ब्लैक बेल्ट माया पटेल - फोटो : अमर उजाला
लहरतारा निवासी ब्लैक बेल्ट माया पटेल कराते में नेशनल फेडरेशन से मान्यता प्राप्त कराते कोच के साथ काशी विद्यापीठ के विश्वविद्यालय खेलों में कराते टीम की महिला कोच रह चुकी है। कराते कोच के साथ ही आज वो दो अंतर्राष्ट्रीय कराते खिलाड़ी की मां भी है। शादी के बाद जब माया पटेल ससुराल आई तो परिवार के लोगों के खयालात ऐसे नहीं थे कि बहू बेटियां घर के बाहर जाकर खेल सके।

लेकिन माया  ने इन बंदिशों को तोड़ते हुए मेहनत की और आज अपनी मेहनत के दम पर कोच बनकर अपने बच्चों को भी सफलता का राह दिखा रही है। शादी के बाद जब माया का बेटा सत्यम बड़ा हुआ तो उसने कराते क्लास में जाना शुरू किया, उस समय माया बच्चे को लेकर क्लास में जाया करती थी।

बच्चे की क्लास में कई लड़कियां कराते का प्रशिक्षण ले रही थी। जिससे माया को भी कराते सीखने की ललक पैदा हुई। फिर क्या था, उन्होंने इसका मन बना लिया, लेकिन परिवार की इसमें सहमति नहीं थी। परिवार के विरोध के बाद माया रोज सुबह और शाम अपने बच्चे के साथ कराते का प्रशिक्षण लिया।

इसके लिए आसपास के लोग और रिश्तेदारों ने इन्हें ताने भी कसे, लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आज माया कई लड़कियों को कराते का प्रशिक्षण देकर खुद को आत्मनिर्भर बना रही है। इनकी कोचिंग में काशी विद्यापीठ टीम खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी के साथ कई अन्य प्रतियोगिता में कई पदक हासिल कर चुकी है। 
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