जमीं नाप लेंगे, आसमां नाप लेंगे, अब निकल पड़े हैं तो जहां नाप लेंगे...। कुछ ऐसे ही अटूट इरादे के साथ अंतरराष्ट्रीय एथलीट बनने के बेटी के सपनों में रंग भरने के लिए संघर्षों का जो हौसला ममता यादव ने दिखाया, वह सिर्फ और सिर्फ एक मां ही कर सकती है।
गरीबी की बेड़ियां भी थीं और परिवार-समाज की बंदिशें भी। दूध बेचे, उपले बेचे। इधर-उधर ठोकरें खाईं लेकिन कभी हार नहीं मानी। मेहनत रंग लाई। राज्य और राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में पदकों की झड़ी लगाते हुए बिटिया अंतरराष्ट्रीय एथलीट बन गई। रानी यादव आज एथलेटिक्स की दुनिया में जाना-पहचाना नाम हैं।
मूलत: चोलापुर ब्लाक के लश्करपुर की रहने वाली ममता का मायका जगतगंज में हैं। ममता की पांच बेटियों में दूसरे नंबर की रानी यादव की खेल में रुचि थी। बेटी होने के नाते परिवारवाले चाहते थे कि थोड़ी-बहुत पढ़ाई-लिखाई कर घर-गृहस्थी के काम में हाथ बंटाए लेकिन ममता ने उसके सपनों को टूटने नहीं दिया।
खुद इंटरमीडिएट पास ममता ने तय किया कि बेटी को आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। इससे नाराज परिवारवालों ने सहयोग नहीं किया। माली हालत काफी खराब हो गई। लेकिन, ममता ने संघर्षों का रास्ता चुना। दूध बेचकर, उपला पाथकर बेटी के सपने को साकार किया।
ममता बताती हैं, उन्हें संघर्ष की यह प्रेरणा अपनी मां गनेशा देवी से मिली थी। बेटी रानी के हौसले को सराहते हुए कहती हैं कि उसने खूब मेहनत की और हमारे संघर्षों को सफल बनाया। बताया, रानी के साथ मास्को (रूस) और जापान तक का सफर कर चुकी हैं।