मां आरती शेखर के साथ चंपक
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अदालत के आदेश के क्रम में सुबह 8:30 बजे एकता को शाम के समय अन्य 11 को रिहा किया गया। एकता के पति रवि सहित 44 लोग अभी जेल में ही हैं। जिला जेल के जेलर पीके त्रिवेदी ने बताया कि 56 लोगों में से 12 की रिहाई संबंधी प्रक्रिया पूरी होने पर उन्हें छोड़ दिया गया है।
अन्य 44 लोगों में से कुछ की अन्य मामलों में जमानत नहीं हुई है। वहीं, कुछ के जमानत संबंधी कागज पूरे नहीं है और कुछ की रिहाई का परवाना नहीं मिला है। महमूरगंज में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता एकता शेखर ने बृहस्पतिवार की सुबह कहा कि दुधमुंही चंपक की चिंता में एक-एक पल पहाड़ की तरह कटा। मेरी बेटी मेरे दूध पर आश्रित है।
बीते 14 दिनों में हर पल यही चिंता सताती थी कि न जाने चंपक कैसे होगी, क्या कर रही होगी और कैसे उसका पेट भरता होगा। आज वह बेहद खुश है और खेल रही है। ऐसा लग रहा है कि मानो उसे दुनिया भर की खुशियां मिल गई हैं।
एकता ने बताया कि 19 दिसंबर को राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान के शहादत दिवस पर बेनियाबाग मैदान में सभी होनी थी। सभा में इस बात पर भी चर्चा होनी थी कि क्या संविधान में छेड़छाड़ कर नागरिकता संशोधन कानून बनाया गया है।
वह और रवि सुबह 10 बजे के लगभग घर से निकले और गलियों से होते हुए बेनिया पहुंचे, इसी बीच पुलिस उन्हें हिरासत में ले ली। 12 बजे के लगभग सभी को पुलिस लाइन ले जाया गया तो वहां सभा की गई। शाम के छह बजे के लगभग पता लगा कि सभी को गिरफ्तार कर जिला जेल भेजा जा रहा है।
हमें बच्ची का दूध, डायपर सहित अन्य सामान घर ले जाना था। जब तय हो गया कि जेल जाना ही है तो जेठ शशिकांत तिवारी को बुला कर उन्हें सब कुछ बता कर हम लोग अंदर चले गए।
14 दिन में पति से दो बार मिली, मूली के पत्ते की सब्जी देते थे
एकता ने बताया कि जेल भेजे जाने के बाद अगले पांच दिन तक उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया गया। अधिकारी कहते थे कि ऊपर से बहुत दबाव है और परिजनों को गेट से ही बाहर भेज दिया जाता था। जेलर से बात की गई तो उन्होंने मना कर दिया।
रवि ने भूख हड़ताल शुरू की तो जेलर ने पांच मिनट के लिए उनसे मुलाकात कराई। बीते 14 दिन में जेल में वह और रवि सिर्फ दो बार मिले। जेल में मूली की पत्ती की सब्जी खाने में दी जाती थी। विरोध किया गया तो गोभी की सब्जी के देने के साथ ही खाने की गुणवत्ता में सुधार हुआ। जेठ शशिकांत पहले दिन से ही कचहरी से जेल तक का चक्कर काट रहे थे। उन्हीं के प्रयास से हम सबकी रिहाई संभव हो सकी।
एकता ने कहा कि एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जेल में रहना गर्व की बात थी, लेकिन मां होने के नाते बच्ची से दूर रहना बहुत तकलीफदेह रहा। एक मां के तौर पर 14 दिन वनवास की तरह प्रतीत हुए। यह तकलीफ मेरी बेटी के लिए ताकत बनेगी।
नागरिकता संशोधन कानून देश को संगठित करने के लिए होना चाहिए। देश को तोड़ने के कोई कानून नहीं बनाया जाना चाहिए। झारखंड की जनता ने इस कानून के विरोध में मतदान कर केंद्र सरकार को संदेश दिया है। अन्य राज्यों के लोगों में भी इस कानून के प्रति खासी नाराजगी है।