नाल दूल्हा कमेटी की निगरानी में निकलने के पहले ही उसके तय रास्तों पर जगह-जगह अंगारे जलाकर फैला दिए गए। शिवाला से निकलकर दूल्हे का जुलूस जैसे-जैसे आगे चलता रहा। जुलूस में शामिल लोग अंगारों पर बेखतर कूदते हुए आगे बढ़ते रहे।
दूल्हे का जुलूस धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। गलियों और सड़कों से गुजरते दूल्हे के जुलूस में लोग अकीदतन दूल्हे को छूने की कोशिश में लगे रहे। सचिव दुल्हा कमेटी मो. खालिद ने बताया कि जुलूस पूरी रात शिवाला, दुर्गाकुंड, विजया, गौरीगंज, भेलूपुरा, रेवड़ी तालाब, नई सड़क, दालमंडी, फाटक शेख सलीम, लल्लापुरा, फातमान, चेतगंज, नई सड़क से रेशम कटरा होते हुए लंगड़ा हाफिज, गिरजाघर से गोदौलिया, मदनपुरा, छिप्पीटोला होते हुए शिवाला पहुंचेगा।
क्या है दूल्हे के नाल का इतिहास :
दूल्हा कमेटी के सचिव मो खालिद का कहना है कि बताया जाता है कि एक हिंदू कुम्हार के बेटे को अचानक गंगा तट पर शिवाला घाट के पास पानी में एक घोड़े की नाल मिली और वह या हुसैन, या हुसैन चिल्लाते हुए भागने लगा। काफी देर तक भागने के बाद वह बेहोश हो गया।
ऐसी मान्यता है कि उसे जो घोड़े की नाल मिली वह कर्बला के जंग से जुड़ी हुई रही होगी। इसी के बाद से हर साल किसी एक युवक को दूल्हा बनाया जाता है। कई युवक एक साथ बैठते हैं और बीच में नाल रखा होता है। मान्यता है कि एक रूहानी शक्ति किसी एक युवक पर आ जाती है और वह खुद उठकर नाल को उठा लेता है।