वाराणसी। ना या हुसैन की सदाएं, ना जनाबे सकीना की। मुहर्रम की तीसरी तारीख पर 150 साल पुरानी रवायत की खानापूर्ति हुई। नवाब की ड्योढ़ी से हर साल उठने वाला अलम व दुलदुल का जुलूस नहीं उठाया गया। कोरोना संक्रमण के कारण केवल रवायत निभाई गई और शहनाई के जरिए नौहा मातम और मजलिस हुई। रविवार को मुहर्रम की तीसरी तारीख पर औसानगंज में स्थित नवाब की ड्योढ़ी पर सन्नाटा पसरा हुआ था।
हर साल जहां मुहर्रम की तीसरी तारीख पर सुबह से ही अजादारों के आने का सिलसिला शुरू होता था वहां रविवार को ड्योढ़ी के दरवाजे ही बंद रहे। अमर उजाला की टीम जब नवाब की ड्योढ़ी पर पहुंची तो वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। दरवाजे पर काफी देर तक दस्तक देने के बाद जब दरवाजा खुला तो मेहंदी बख्त बाहर निकले। उनके चेहरे पर भी उदासी थी। हम लोग जब इमाम हुसैन के ताजिये को देखने पहुुंचे तो वहां भी ताला ही लटका था। उन्होंने ताला खोला और चिराग रौशन किए।
सुनहरी आभा से जगमगा रहा था इमामबाड़ा
सुनहरे रंगों से जगमगामा इमाम हुसैन का इमामबाड़ा आंखों के सामने था। वहीं बगल में जनाबे सकीना का ताबूत भी रखा हुआ था। मेहंदी बख्त ने बताया कि इस कमरे की टाइल्स 1920 में बिछाई गई तो आज भी वैसे ही सुरक्षित है।
कहते हैं नवाब की ड्योढ़ी
मेहंदी बख्त ने बताया की उनके पूर्वज मिर्जा महमूद ने काशी में ताजिए की शुरुआत की थी। इसके बाद मिर्जा कामरान ने इस रवायत को आगे बढ़ाया। बहुत से लोग इसे कामरान का बाड़ा तो बहुत से लोग इसको नवाब की ड्योढ़ी भी कहते हैं।
पिछले साल थी रौनक, इस साल सन्नाटा
पिछले साल की यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया दोपहर तक तो पूरा कैंपस लोगों से भर जाता था। सुबह से तैयारियां शुरू होती थी और दोपहर से जुलूस निकलने का सिललिसा शुरू हो जाता था। दुलदुल और अलम को सजाने के बाद जुलूस निकलता था। लोहटिया, काशीपुरा, राजादरवाजा, दालमंडी चौक, कालीमहाल होते हुए जुलूस फातमान पहुंचता था। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार सन्नाटा पसरा हुआ है।
निभाई गई रवायत
शाम को नवाब की ड्योढ़ी पर शहनाई के जरिए नौहा मातम पेश हुआ और उसके बाद परिवार के लोगों ने मजलिस की रवायत निभाई।