वाराणसी में कृष्ण और उनकी मां का अभिनंदन
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सोमवार को तुलसी घाट पर कृष्ण कुमार और उनकी मां का नागरिक अभिनंदन किया गया। संकट मोचन मंदिर के महंत व आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर विशंभर नाथ मिश्र ने उनका माल्यार्पण कर अंगवस्त्रम से स्वागत किया।
इस अवसर पर संकट मोचन मंदिर के महंत ने कहा कि मां के लिए समर्पित ऐसे पुत्र का अभिनंदन होना ही चाहिए। इससे समाज में एक अच्छा संदेश जाएगा। आज की युवा पीढ़ी भी अपने मां-बाप की इसी तरह से सेवा करेगी। वहीं दक्षिणामूर्ति कृष्ण कुमार ने बताया कि उनकी यही इच्छा है कि उनकी मां देश के सभी मंदिरों में दर्शन पूजन करें। वह अपने पिता द्वारा उपहार में मिली बजाज चेतक स्कूटर से ही इस पावन यात्रा पर निकले हैं।
Prayagraj News : स्कूटर पर मां को बैठाकर भारत भ्रमण के लिए निकले मैसूर के कृष्ण।
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पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर रहे कृष्ण कुमार ने शादी नहीं की। अपने बारे में उन्होंने बताया कि कर्नाटक के मैसूर में उनकी मां ने ताउम्र संयुक्त परिवार की सेवा में बिता दी। वन विभाग में कार्यरत रहे पिता दक्षिणामूर्ति की 2015 में मृत्यु हुई तो बंगलौर में रह रहे कृष्ण कुमार उन्हें अपने पास ले आए। शाम को ऑफिस से लौटकर दोनो मां-बेटे आपस में बात करते तो एक दिन मां ने बताया कि उन्होंने घर के बाहर कभी कोई स्थान नहीं देखा।
जिस पर उन्हें लगा जिस मां ने उन्हें पूरी दुनिया देखने के काबिल बनाया, घर के हर शख्स को बनाने के लिए अपना पूरा जीवन खपा दिया। अब वह मां को दुनिया दर्शन कराएंगे। लिहाजा वर्ष 2016 में उन्होंने नौकरी छोड़कर यात्रा शुरु कर दी। इस यात्रा में उन्होंने पिता के स्कूटर को हमसफर बनाया, ताकि पिता की याद भी बनी रहे। इसी स्कूटर से वह नेपाल, भूटान, म्यांमार देशों की यात्रा मां के साथ कर चुके हैं और अब कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरे दर्शन पर निकले हैं।
वाराणसी में कृष्ण और उनकी मां
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अनुभव साझा करते हुए कृष्ण कुमार ने बताया लॉकडाउन के दौरान वह मां के साथ यात्रा पर थे। भूटान सीमा पहुंचे तो पता चला सीमाएं सील हैं। कोरोना के उस दौर में एक माह 22 दिन उन्होंने भारत-भूटान सीमा के जंगलों में गुजारे। इसके बाद जब उनका पास बना तो एक सप्ताह में 2673 किलोमीटर स्कूटर चलाकर वापस मैसूर आ गए। सब कुछ सामान्य होने के बाद 15 अगस्त 2022 से उन्होंने दोबारा यात्रा शुरु की है।
यात्रा के पीछे की प्रेरणा के बारे में वह बताते हैं कि जब लोग दुनिया से अंतिम विदा ले लेते हैं तो उनकी फोटो पर माला चढ़ाकर मृतक की इच्छाओं के बारे में बाते करते हैं, उन्हें याद करते हैं। जबकि रिश्तों को, व्यक्तियों का खयाल जीते जी रखना चाहिए। मैं यह मलाल लेकर नहीं जीना चाहता था। इसलिए पिता के गुजर जाने के बाद मां को अकेला छोड़ने की बजाय उन्हें दुनिया दिखाने का निर्णय किया और यात्रा पर निकल पड़े।