मोबाइल गेम दिन प्रतिदिन बच्चों पर हावी हो रहे हैं। लखनऊ में हुई घटना इसका ताजा उदाहरण है। नाबालिग द्वारा मां को गोली मारने से हर कोई हतप्रभ है। इस तरह के गेम खेलने वाले बच्चे खुद को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ दूसरों को भी चोट पहुंचाने से गुरेज नहीं करते।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल गेम केवल मनोरंजन का साधन है, लेकिन अब धीरे-धीरे यह लत में तब्दील हो रहा है। ऐसे गेम खेलने वाले बच्चों की निगरानी बहुत जरूरी है।
स्कूल और हॉस्टल में होती है काउंसिलिंग
बच्चों के व्यवहार को लेकर स्कूल में समय-समय पर काउंसिलिंग होती है। बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन को लेकर अध्ययन कराया जाता है। अगर किसी तरह की समस्या होती है तो उसका समाधान किया जाता है। - दीपक बजाज, चेयरमैन, जैपुरिया स्कूल्स बनारस
लॉकडाउन से बच्चों के व्यवहार में बहुत परिवर्तन हुआ है। स्कूल में शिक्षकों की टीम बनाई गई है, जो उनकी काउंसिलिंग करती है। इसके अलावा बाहर से भी काउंसलर्स बुलाए जाते हैं। - डॉ. रेणुका नागर, वनिता पब्लिक स्कूल
पबजी खेलने से मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। एकाग्रता का स्तर कम होने के साथ ही पढ़ाई की उपेक्षा होती है। विद्यालयाें में इस बारे में भी जागरूक करने की जरूरत है। - अनुपमा मिश्रा, सनबीम स्कूल वरुणा
क्या करें अभिभावक
गूगल प्ले स्टोर पर जाएं। सेटिंग ऑप्शन में माय एप्स एंड गेम्स खोलें। लाइब्रेरी, अपडेट्स और इन्स्टॉल्ड में जाकर देखें कि क्या इंस्टॉल और क्या अनस्टॉल है।
बच्चों के मोबाइल में अभिभावक अपना मेल आईडी और पासवर्ड दें। बच्चे जब कोई गेम, एप इंस्टॉल करेंगे तो पहले आपसे पासवर्ड मांगेंगे या फिर उसकी जानकारी मेल पर आ जाएगी।
बच्चों को दें मोबाइल तो करते रहें निगरानी
बच्चे जब मोबाइल फोन चलाएं तो उसी निगरानी करते रहें। इंटरनेट पर बहुत सी साइटें हैं, जिसका बच्चों पर विपरीत असर पड़ता है। अगर घर के सदस्य दूर दूर रहते हैं तो किसी न किसी तरीके से सभी का आपस में जुड़ाव होना चाहिए। बच्चों को सामाजिक उत्तरदायित्व और संस्कारों के बारे में बताते रहें। इंटरनेट संवेदनहीनता को बढ़ावा देता है। घर में बंदूक है तो उसे बच्चों से दूर रखे। - प्रो. श्वेता प्रसाद, समाजशास्त्र विभाग बीएचयू