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यादें आपातकाल की: बनारस के कई छात्र नेताओं को मिली थी जेल, 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक घोषित था आपातकाल

Tue, 25 Jun 2024 03:29 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक आपातकाल घोषित था। आज भी आपातकाल की काली स्मृतियां लोगों की जेहन में ताजी हैं। आपातकाल के दौरान बनारस के कई छात्र नेताओं को जेल मिली थी। 
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राधेश्याम सिंह - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। इस दौरान बनारस के कई छात्रनेता भी जेल गए और यातनाएं सहनी पड़ीं।

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पिता के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाए राधेश्याम सिंह
इमरजेंसी की जानकारी होते ही 26 जून 1975 को पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष देवव्रत मजूमदार, 1975 के बीएचयू के छात्र संघ अध्यक्ष मोहन प्रकाश के साथ समाजवादी युवजन सभा के युवा नेता राधेश्याम सिंह भूमिगत हो गए। मोहन प्रकाश के घर बहुत ही तगड़ी कुर्की हुई। मोहन छात्रसंघ अध्यक्ष थे, इसलिए उन्होंने डीएम से लैंडलाइन फोन से शिकायत दर्ज कराई। डीएम ने पता लगा लिया कि लैंडलाइन फोन कनेक्शन किसके नाम से है और छापा मारा। तीनों लोग चार जुलाई को मलदहिया से गिरफ्तार हो गए। 

16 जुलाई को लोकतंत्र सेनानियों की बढ़ती संख्या को देख सेंट्रल जेल भेज दिया गया, जहां 18 महीने जेल में रहे। राधेश्याम सिंह के पिता हिमाचल सिंह वकील थे और सेंट्रल बार के अध्यक्ष थे। उनका हृदयाघात से चार नवंबर 1976 को देहांत हो गया। पिता के अंतिम दर्शन के लिए पेरोल तक नहीं मिली। इस बात को बताते हुए राधेश्याम सिंह की आंखें भर आईं। 

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72 साल के हो चुके समाजवादी नेता राधेश्याम सिंह बताते हैं कि जेल में तरह-तरह की यातनाएं दी जाती थीं। एक साथी अशोक पांडेय को जाड़े की रात में पानी के कुंड में रहने को विवश किया गया था। अधिवक्ता प्रहलाद तिवारी बताते हैं कि उनके हाथ-पैर में बेड़ियां डालकर तन्हाई में रखा गया था। कल्याण सिंह और लालमुनि चौबे के विरोध के बाद कुछ राहत मिली। हालांकि, हम सभी राजनैतिक कैदी के तौर पर थे।

राजनैतिक बात करने की मनाही थी
राधेश्याम सिंह बताते हैं कि उनसे मिलने उनकी माता जेल में आई थीं। पूछा कि इंदिराजी क का हाल हौ तो बीच में मौजूद पुलिसकर्मी ने कहा घर परिवार की बात करें और दंड स्वरूप एक महीना घर वालों से मिलने पर पाबंदी लगा दी। हम लोगों ने तो रिहाई की उम्मीद ही छोड़ दी थी।
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डीआईआर में बेल मिली तो मीसा में बंद कर दिया

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रहलाद तिवारी बताते हैं कि उन्हें पहले डिफेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट में बंद किया गया था। इसमें उन्हें छह महीने में बेल मिल गई। वे राजनैतिक रूप से जब पुन: सक्रिय हुए तो दोबारा मीसा में बंद कर दिया गया।

पुलिस ने घर को बना दिया था छावनी
राजनारायण के दाहिने हाथ कहे जाने वाले रविंद्र पुरी कॉलोनी निवासी अनिरुद्ध नारायण सिंह बताते हैं कि वे बीएचयू के उपाध्यक्ष रह चुके थे। पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए उनके घर को छावनी बना दिया। घर से कुछ दूरी पर उन्हें जब इस बात का पता चला हुआ तो वह लौट गए। उनके चाचा जगरनाथ सिंह मजिस्ट्रेट थे। इसलिए पुलिस ने कुर्की नहीं की। भरत सिंह भी उनके घर छिपने पहुंचे मगर घर वालों ने उन्हें बताया कि बराबर दबिश दे रही है तो वे बगल के गांव सागरपुर चले गए।
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