सरकारी अनुदान से चलने वाली शिक्षण संस्थाओं में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण नहीं हो सकता है। इसी सोच के साथ विद्यापीठों की स्थापना शुरू हुई थी। काशी विद्यापीठ के प्रो. अजीत कुमार शुक्ला ने बताया कि विद्यापीठ को संचालित करने के लिए बाबू शिव प्रसाद गुप्त ने 10 लाख रुपये से शिक्षा निधि के नाम से एक ट्रस्ट बनाया।
उसके ब्याज के अलावा 40 हजार रुपये प्रतिवर्ष देने का आश्वासन भी दिया था। शुरू में कुछ आर्थिक कठिनाई आईं तो उन्होंने चौक कटरा से होने वाली आय को भी दान दे दिया। भदैनी के बाद विद्यापीठ कर्णघंटा स्थित एक धर्मशाला में स्थानांतरित किया गया। बाद में राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने चकला बाग की जमीन खरीदी और ट्रस्ट को को दान दे दिया जो वर्तमान में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के रूप में मौजूद है।
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ
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विश्वविद्यालय का नाम स्थापना काल से अब तक तीन बार परिवर्तित हुआ, लेकिन मूल स्वरूप आज भी बरकरार है। स्थापना के समय इसका नाम श्री काशी विद्यापीठ रखा गया था। 1963 में विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद इसका नाम काशी विद्यापीठ हुआ। बापू की 125वीं जयंती पर 11 जुलाई 1995 को इसके नाम के आगे महात्मा गांधी जोड़ दिया गया और वर्तमान में यह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के ही नाम से जाना जाता है।
काशी विद्यापीठ के पहले प्रबंधन बोर्ड में महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, पंडित जवाहर लाल नेहरू, जमुना लाल बजाज, आचार्य नरेंद्र देव, पीडी टंडन, बाबू शिव प्रसाद गुप्त और डॉ. भगवान दास थे।
पूर्व छात्रों की है गौरवशाली परंपरा
काशी विद्यापीठ के पूर्व छात्रों की सूची में कई नाम शामिल हैं जिन्होंने देश का नाम रोशन किया। इसमें चंद्रशेखर आजाद, मनमनथनाथ गुप्त, भोला पवन शास्त्री, लाल बहादुर शास्त्री, पंडित कमलापति त्रिपाठी, बीवी केशकर, राम कृष्ण हेगडे़ और प्रो. राजा राम शास्त्री आदि शामिल हैं।