धर्मार्थ कार्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि प्राचीनकाल से मिथिला ज्ञान विज्ञान का केंद्र रहा है। गौतम ऋषि, याज्ञवल्क्य, चाणक्य, मंडन मिश्र जैसे विद्वानों की भूमि मिथिला रही है जिन्होंने अपने ज्ञान के प्रकाश से संपूर्ण भारत को गौरवान्वित किया है। सही मायने में मिथिला ज्ञान का प्रकाश पुंज है।
वह शनिवार को नागरी प्रचारिणी सभा में मैथिल समाज की ओर से आयोजित दो दिवसीय 11वें महाकवि विद्यापति महोत्सव को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। मुख्य वक्ता पद से बोलते हुए प्रो. शंकर कुमार मिश्र ने कहा कि महाकवि विद्यापति विलक्षण प्रतिभा के कवि थे। कर्मकांड हो या धर्म, दर्शन हो या न्याय, सौंदर्यशास्त्र हो या भक्ति रचना, विरह-व्यथा हो या न्याय सभी क्षेत्रों में विद्यापति अपनी कालजयी रचना के लिये जाने जाते हैं। अध्यक्षता करते हुए प्रो. जयशंकर झा ने कहा कि कवि कोकिल विद्यापति भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान शिव ने चरवाहा का भेष धारण कर उनके काव्य को सुनने आते थे। कार्यक्रम का शुभारंभ धर्मार्थ कार्य मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने महाकवि के चित्र पर दीप जलाकर किया। संस्था के अध्यक्ष निरसन कुमार झा एडवोकेट ने अतिथियों को सम्मानित किया।
महोत्सव में बिखरे मिथिला के लोककला के रंग
महाकवि विद्यापति महोत्सव में मिथिला की लोककला के रंग भी बिखरे। समारोह में मिथिला पेंटिंग, सिक्की पेंटिंग, पाग और मिथिला साहित्य का स्टाल लोगों के आकर्षण का केन्द्र रहा। सांस्कृतिक कार्यक्रम की शृंखला में गायक अजीत लाभ ने जय जय भैरवी, पूर्णिमा झा ने इहेन सुन्दर मिथिला धाम..., उगना हमर कत गेल..., देसिल वअना सब जन मिट्ठा... की सुमधुर प्रस्तुतियां दीं। नंदनी सिंह के नृत्य निर्देशन में मिथिला के लोकनृत्य में विद्यापति की रचना जय-जय भैरवी पर भावपूर्ण नृत्य, लोक महापर्व डाला छठ पर भावपूर्ण नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति कलाकारों ने दी। इस दौरान विशिष्ट अतिथि रमन दास झा, सुभाष, डॉ. जितेंद्र नाथ मिश्र, गौतम कुमार झा, डॉ. विजय कपूर, निरसन कुमार झा, दास पुष्कर, सुधीर चौधरी, भोगेंद्र झा, प्रो. शंकर मिश्र, सौरभ कुमार मौजूद रहे।