उन्होंने घुंघरुओं की झंकार से बारिश की बूंदों और घोड़े की चाल तथा तबले के साथ घुंघरू की जुगलबन्दी से सबको मोहित कर दिया। उन्होंने सबसे पहले शिव वंदना की फिर पारंपरिक कथक उठान, आमद, टुकड़ा परन आदि प्रस्तुत किया।
इसके बाद 18 मात्रा में लक्ष्मी ताल की प्राचीन बंदिश पर कथक प्रस्तुत किया तो समूचा मंदिर प्रांगण ही तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अंत में देवी स्तुति से समापन किया। उनके साथ तबले पर उदयशंकर एवं राजकुमार मिश्रा, सारंगी पर अंकित मिश्रा एवं हारमोनियम सह गायन पर शक्ति मिश्रा रहे।
तीसरी प्रस्तुति दिल्ली से आई विदुषी लावण्या सुंदरम के गायन की रही। उन्होंने सबसे पहले राग बागेश्री में विलंबित मध्य लय एक ताल में और द्रुत तीन ताल में निबद्ध बड़ा ख्याल 'कौन गत भईल पिया न पूछे एकहु बार' और छोटा ख्याल 'सजनवा हरि गुण गाओ' सुनाया।
इसके बाद 'धाय धाय गर लाओ' की बंदिश सुनाया। अंत मे मराठी अभंग 'आईका नारायणा' सुनाकर समापन किया। उनके साथ तबले पर पं. कुबेरनाथ मिश्र एवं हारमोनियम पर पंकज शर्मा संगत पर रहे। चौथी प्रस्तुति दिल्ली से आये प्रख्यात बांसुरी वादक राजेन्द्र प्रसन्ना एवं राजेश प्रसन्ना की रही।
उन्होंने राग झिंझौटी में बड़ा ख्याल विलंबित एक ताल की बंदिश सुनाई, उसके बाद द्रुत तीन ताल में बंदिश सुनाई। अंत मे 15 बांसुरी वादकों ने एक साथ मां को पहाड़ी धुन सुनाया तो हर कोई मंत्रमुग्ध होकर रह गया। तबले पर अभिषेक मिश्र ने संगत की। पांचवी प्रस्तुति प्रो.संगीता पण्डित के शास्त्रीय गायन की रही। उन्होंने सबसे पहले बनारस घराने की प्रसिद्ध राग दुर्गा में निबद्ध बंदिश 'जय दुर्गे मातु भवानी' सुनाया।
इसके बाद राग मारवाह में बंदिश 'जगत जननी जगदम्ब भवानी' और अंत मे मां काली के भजन से समापन किया। उनके साथ तबले पर अभिनव नारायण आचार्य, हारमोनियम पर पंकज शर्मा एवं सह गायन शमयीता पांजा ने साथ दिया। कलाकारों का स्वागत महंत राजनाथ दुबे एवं संयोजक पं. विश्वजीत दुबे ने किया। संचालन सोनू झा ने किया।
जवा हार से सजी मां कूष्मांडा, हुआ राजर्षि शृंगार
महोत्सव के तीसरे दिन भगवती मां कूष्मांडा का सोने के जवा हार (गुड़हल की कली) से दिव्य राजर्षि शृगार हुआ। पंचामृत स्नान के बाद मां को चटख लाल बनारसी साड़ी से सुसज्जित कर कोलकाता से आये गुलाब, कतुआ, बेला, रजनीगन्धा से सजाया गया। सायंकाल छह बजे शृगार के बाद मंदिर का पट श्रद्धालुओं के लिए खोल गया।
मां की दिव्य स्वर्णमयी छवि का दर्शन करने श्रद्धालुओं का रेला उमड़ पड़ा। भक्तों में प्रसाद स्वरूप पांच कुंतल मेवे का हलवा वितरित किया गया। श्रृंगार पं. कौशलपति द्विवेदी एवं आरती पं. किशन दूबे ने उतारी। संजय दुबे, विकास दुबे एवं किशन दुबे ने सहयोग किया।