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मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करते हैं बाबा विश्वनाथ, ये है देवी पुराण में माता की गाथा

Sat, 01 Feb 2020 07:05 PM IST
गीतार्जुन गौतम आलोक कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
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मां विशालाक्षी। - फोटो : अमर उजाला।
भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी पुरातत्व, पौराणिक कथाओं, भूगोल, कला और इतिहास का संजोए हुए है। हिंदुओं के सात पवित्र पुरियों में से एक काशी को मंदिरों एवं घाटों का नगर भी कहा जाता है। ऐसा ही एक मंदिर है काशी विशालाक्षी मंदिर। जिसका वर्णन देवी पुराण में किया गया है। देवी विशालाक्षी की पूजा उपासना से सौंदर्य और धन की प्राप्ति होती है। यहां दान, जप और यज्ञ करने पर मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि यदि आप यहां 41 मंगलवार कुमकुम का प्रसाद चढ़ाते हैं तो इससे देवी मां आपकी झोली भर देंगी।
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विशाल नेत्रों वाली मां विशालाक्षी का यह स्थान मां सती के 51 शक्ति पीठों में से भी एक है। इनका महत्व कांची की मां (कृपा दृष्टा) कामाक्षी और मदुरै की (मत्स्य नेत्री) मीनाक्षी के समान है। शास्त्रों के अनुसार काशी के कर्ताधर्ता बाबा विश्वनाथ मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करते हैं। स्कंद पुराण कथा के अनुसार जब ऋषि व्यास को वाराणसी में कोई भी भोजन अर्पण नहीं कर रहा था, तब विशालाक्षी एक गृहिणी की भूमिका में प्रकट हुईं और ऋषि व्यास को भोजन दिया। विशालाक्षी की भूमिका बिलकुल अन्नपूर्णा के समान थी।
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काशी के नव शक्ति पीठों में मां विशालाक्षी का महत्वपूर्ण स्थान है। मीरघाट पर गलियों से होते हुए पहुंचने पर धर्मेश्वर महादेव के निकट ही मां विशालाक्षी का भव्य मंदिर स्थित है। मान्यता के अनुसार इस स्थान पर मां सती का कर्ण कुण्डल और उनकी आंख गिरी थी। जिससे इस स्थान की महिमा और महात्म्य दोनों काफी बढ़ गए।

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लोग यहां मां की उपस्थिति मानकर दर्शन-पूजन करने लगे। बाद में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में मां विशालाक्षी की दो मूर्तियां हैं। सन् 1971 में अभिषेक कराते समय पुजारी की गलती से मां की मुख्य प्रतिमा की अंगुली खण्डित हो गयी थी। जिसके बाद खण्डित प्रतिमा के आगे मां की दूसरी प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई।
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दक्षिण भारतीय शैली का है मंदिर
मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी के अनुसार मंदिर का जीर्णोद्धार सन् 1908 में मद्रासियों ने कराया। गर्भगृह को छोड़कर मंदिर का अन्य भाग दक्षिण भारतीय मंदिर शैली का बना हुआ है। मंदिर के बाहरी भाग पर रंग-बिरंगे रूप में गणेश जी, शंकर जी समेत कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। यहां की शक्ति विशालाक्षी माता तथा भैरव काल भैरव हैं। मंदिर में भादों मास पर भव्य आयोजन किया जाता है।
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माह की कृष्ण पक्ष तृतीया को मां विशालाक्षी का जन्म दिन धूम-धाम से मनाया जाता है। इस मौके पर मां का भव्य शृंगार किया जाता है। जिसका दर्शन करने के लिए आस-पास के श्रद्धालुओं के अलावा काफी संख्या में दक्षिण भारतीय भी आते हैं। चैत्र नवरात्र में मां के दर्शन-पूजन के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। नवरात्र की पंचमी को नौ गौरी स्वरूप में भी मां विशालाक्षी का दर्शन होता है। मां विशालाक्षी के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि व यश बढ़ता है।
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