सातवें चरण के मतदान में बलिया अकेली संसदीय सीट है, जहां दो उम्मीदवार आमने-सामने हैं। भाजपा ने वीरेंद्र सिंह मस्त को भदोही से भेजा है तो सपा-बसपा गठबंधन सनातन पांडेय को आजमा रहा है। तीसरा मजबूत प्रत्याशी न होने से हर दिन अलग-अलग ध्रुवीकरण हो रहा है। जातीय गुणा-गणित से जुड़े मुद्दे उछाले जा रहे हैं। खास पहलू यह है कि करीब चार दशक बाद इस सीट से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के परिवार का सदस्य चुनाव मैदान में नहीं है।
2014 में भाजपा के भरत सिंह जीते थे, लेकिन उन पर दोबारा भरोसा नहीं किया गया। वीरेंद्र सिंह मस्त को शुरूआती दौर में ही प्रत्याशी घोषित कर दिया। दूसरी ओर सपा-बसपा गठबंधन नामांकन की आखिरी तारीख तक प्रत्याशी तय नहीं कर पाए। कांग्रेस को उम्मीदवार ही नहीं मिला और जन अधिकार पार्टी के अमर जीत यादव का नामांकन निरस्त हो गया। इस सीट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चुनावी सभाएं हो चुकी हैं।
भाजपा अपने परंपरागत मतदाताओं के भरोसे है, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ रहा एक बड़ा वर्ग सनातन पांडेय की ओर शिफ्ट होता नजर आ रहा है। हालांकि भाजपा के लिए इसकी भरपाई चंद्रशेखर के अनुयाई और उनके बेटे पूर्व सांसद नीरज शेखर के समर्थक कर रहे हैं। नीरज को टिकट नहीं देना सपा को भारी पड़ रहा है। कांग्रेस के जो भी मतदाता हैं, वे या तो खुले तौर पर भाजपा के साथ हैं या फिर गठबंधन का प्रचार कर रहे हैं। भाजपा को आंखे दिखा रहे सुभासपा अध्यक्ष और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने यहां से विनोद तिवारी पर दांव लगाया है। राजभर के लिए ब्राह्मण प्रत्याशी के बूते राजभर के साथ-साथ कुछ और बिरादरियों को अपने पाले में खींचने की चुनौती है। माना जाता है कि राजभर गाजीपुर और बलिया में पूर्वांचल के और जिलों के मुकाबले ज्यादा प्रभाव रखते हैं।
स्थानीय मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं
कोई भी दल स्थानीय मुद्दे नहीं उठा रहा है। यही कारण है कि विकास, राष्ट्रवाद, सुरक्षा और जीएसटी मुद्दे हैं। प्रदीप कुमार राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट करेंगे, जबकि सिराजुद्दीन के लिए जीएसटी मुद्दा है। रामपुर महावल के सत्य नारायण उद्योग न लगने की बात कहते हैं तो बरसात में गंगा कटान की पीड़ा को भी बयां करते हैं।