मनोज सिन्हा न तो राजनीतिक विरोधियों की बात करते हैं और न ही किसी विवादित मुद्दे की, सिर्फ मोदी सरकार की उपलब्धियों की चर्चा करते हैं। स्थानीय राजनीति पर चर्चा से बचते हैं। उनका मुकाबला अफजाल अंसारी से है, जो पहले सपा से सांसद रह चुके हैं। दबंग बाहुबली नेता हैं। हत्या, अपहरण जैसे कई मुकदमों में आरोपी हैं। फिलहाल विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के मामले में जमानत पर हैं, जबकि उनका छोटा भाई मुख्तार अंसारी अभी भी जेल में है। अंसारी बंधुओं के दादाजी मुख्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन इन भाइयों ने पूर्वांचल में ‘गन कल्चर’ को बढ़ावा दिया। विधायक रहा मुख्तार अंसारी विहिप के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष नंद किशोर रुंगटा से लेकर कृष्णानंद राय तक कई नामी लोगों की हत्या में नामजद थे। अवधेश राय और बृजेश सिंह के गैंग से लगातार मुठभेड़ होती रहती थी उनकी। वहीं, कांग्रेस उम्मीदवार अजीत प्रताप कुशवाहा पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की पार्टी से हैं। पेशे से वकील अजीत 2017 में जंगीपुर विधानसभा से जन अधिकार पार्टी से लड़ चुके हैं, लेकिन 5वें स्थान पर रहे थे।
एक दूसरे को हरा चुके हैं सिन्हा-अफजाल
मनोज सिन्हा और अफजाल में पहला मुकाबला 1999 में हुआ, जो सिन्हा ने जीता। 2004 में अफजाल ने सिन्हा को हराया और सांसद बने। 2009 में सिन्हा बलिया से लड़े, पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर से हार गए। गाजीपुर से लड़े अफजाल भी जीते। 2014 में सिन्हा फिर गाजीपुर से लड़े और केंद्र में मंत्री बने, जबकि अफजाल बलिया से अपनी नई पार्टी कौमी एकता दल से लड़े, लेकिन संसद पहुंचने में विफल रहे।
यादव परिवार की जंग की जड़ में अंसारी बंधु
मुलायम परिवार में शुरू हुई जंग की जड़ में अंसारी बंधु ही हैं। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने इन्हें सपा में शामिल कर लिया था। अगले ही दिन अखिलेश यादव के दबाव में मुलायम सिंह ने इन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। तब अफजाल ने मुलायम और अखिलेश के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। माना जा रहा है कि गाजीपुर के यादव अपने नेताओं के अपमान को नहीं भुला पाए हैं। हालांकि जमानिया के पास के गांव के किसान जोखू प्रसाद यादव कहते हैं कि जब हमारे नेता ही उन्हें माफ कर चुके हैं तो हम अफजाल के प्रति कटुता क्यों रखें?
जातीय गणित
सवर्ण- 3.80 लाख
एससी- 3.00 लाख
मुस्लिम- 2.00 लाख