सूरज ने बताया कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन कोरोना के चलते देश में लॉकडाउन हो गया और काम बंद हो गया। हम लोगों के पास जो भी पैसा था वो भी खत्म हो गया। हम सब दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए। शहर में हम मजदूरों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं था। मकान मालिक ने किराए का दबाव बनाया और साथ ही राशन की दुकान उधार नहीं मिल रहा था।
महेश ने कहा कि ठेकेदार द्वारा बड़े-बड़े वादे किए गए थे। हम भी अच्छे भविष्य का सपना संजोए मुंबई पहुंच गए, लेकिन जब हम सब का बुरा समय आया तो हमें अच्छे भविष्य के सपने दिखाने वाला ठेकेदार भी फोन बंद करके भाग गया। अपने पास जो भी समान था, उसे बेच कर किसी तरह गुजारा किया पैसा खत्म होने घर उधार मांग कर किसी तरह घर पहुंचे।
मनोज कुमार ने बताया कि घर से दूर हूं, मैं बहुत मजबूर हूं, हां आप सही समझें, मैं एक मजदूर हूं। काम की तलाश में कहीं दूर निकल आया था, वापिस जाना इतना मुश्किल होगा, यह कभी सोच नहीं पाया था। लेकिन जिन कष्टों को उठाते हुए मैं अपने घर पहुंचा हूं यह मेरी ही आत्मा ही जानती हैं। जब उन कष्टों को याद करता हूं तो रोम रोम सिहर जाता है। अब तो जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता।