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बागों की तरह घरों में झूलों ने डाला डेरा

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सावन भले ही 25 जुलाई से शुरू हो रहा है, लेकिन उसका सुरूर अभी से चहुंओर दिखने लगा है। गांवों में तो पेड़ों पर झूले का लुत्फ बच्चे से लेकर महिलाएं तक उठा रहे हैं। कुछ ऐसा ही शहरों में भी दिखने लगा है। यहां लॉन, बालकनी और छत के कोने में झूला रखकर झूलने की ख्वाहिश पूरी की जा रही है। बाजार में सिंगल और डबल सीटर हर प्रकार के झूले हैं। विक्रे ताओं के अनुसार सावन में झूलों की मांग बढ़ जाती है। घरों में झूले लगाने वालों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। लोग लकड़ी, तार, लोहा, बांस और केन के बने झूले घर में सजा रहे हैं। उपहार में भी झूले देने का ट्रेंड शुरू हो गया है।
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सिंधारे में भेजते हैं झूला
सावन में झूला झूलने का विशेष महत्व है। संभ्रांत परिवारों के लोग बेटियों व बहुओं को हरियाली तीज के पहले सिंधारे में झूले भी भेज रहे है। इंटीरियर एक्सपर्ट पलक अग्रवाल कहती है शहर में ऐसे कई परिवार हैं, जिन्होंने बेटियों, बहुओं को झूले सिंधारे में दिए हैं।
मायके में सखियों संग झूलते थे झूला
बिरोदपुर निवासी प्रिया अग्रवाल बताती हैं कि बचपन में सावन माह शुरू होते ही घर के पास बगीचे में झूला लग जाता था। जिसपर हम सब सखियों संग झूला झूलते थे। ढोलक पर नृत्य, गीत-संगीत का माहौल होता था। हम सभी मिलकर हाथों में मेहंदी रचाते थे।
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आज भी सावन के झूलों की याद आती है
लोक गायिका प्रतिमा पांडेय कहती हैं कि आज बच्चों की जिद पर घर में छोटे झूले डाल दिए जाते हैं। सच बात तो ये है कि आज भी मायके में बिताए सावन याद हैं। जो कभी सखियों के साथ हम गांव के आम के बगीचों में झूला करते थे।
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