जलतीर्थों की नगरी में पौराणिक कुंडों के रखरखाव में लापरवाही के भयावह परिणाम सामने आने लगे हैं। जिन कुंडों से लोक मानस की आस्था जुड़ी है, जहां पुण्य की डुबकी ही नहीं लगती, पुरखों के नाम पर तर्पण-अर्पण की भी परंपरा है, उनको संभालने में नगर निगम नाकाम साबित हुआ है। इसका नतीजा शनिवार को आदि गंगा के रूप में विख्यात ईश्वरगंगी कुंड में बड़ी तादाद में मछलियों की मौत के रूप में सामने आया। दुर्गंध फैलने से लोग सांसत में हैं। पिछले पखवारे भर से इन कुंडों की यात्रा कर उनकी दशा की पड़ताल में जुटे ‘अमर उजाला’ ने पौराणिक महत्व के दुर्गाकुंड, सूरज कुंड, पुष्कर कुंड में भी ऐसी ही चिंताओं को रेखांकित कर उनके संरक्षण के उपायों पर जोर दिया है लेकिन अभी तक अफसरों के कान पर जूं नहीं रेंगी। इन कुंडों में सड़न पैदा होने से इसकी महिमा तो घटी ही है लेकिन मछलियों के मरने से पर्यावरण पर भी असर पड़ा है। विडंबना यह है कि एक तरफ तो तालाबों के संरक्षण को लेकर अफसर विचार मंथन में जुटे थे और दूसरी ओर ईश्वरगंगी कुंड में मछलियां तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही थीं...।
काशी की आदि गंगा कहे जाने वाले ईश्वरगंगी कुंड में सड़न फैल गई है। काई की मोटी परतों से युक्त पानी सड़ने और आक्सीजन की कमी होने से इस कुंड में पिछले 48 घंटे से मछलियां दम तोड़ रही हैं। अब तक 20 क्विंटल से अधिक मछलियों की मौत हो चुकी है। नगर निगम प्रशासन ने शनिवार को मरी मछलियों को दो वाहनों पर लदवाकर निस्तारित कराया। कुंड में पोटैशियम पर मैगनेट के अलावा अन्य कीटनाशक छोड़े गए, ताकि बीमारी फैलने से रोका जा सके।
ऑक्सीजन की कमी के चलते कई कुंडों में मछलियों के मरने का सिलसिला शुरू हो गया है। कुंडों में सीवर बहाने, कूड़ा-कचरा फेंके जाने से दुर्गंद उठ रही है और वहां खड़ा होना मुश्किल है। ईश्वरगंगी कुंड में ऑक्सीजन की कमी होने से बड़ी तादाद में मछलियों की मौत हो गई। शहर के बीच स्थित इस कुंड में शुक्रवार से ही मछलियों के मरने का सिलसिला शुरू है। नगर निगम के निरीक्षक महेंद्र ने कर्मचारियों के साथ शनिवार को ईश्वरगंगी कुंड से मरी मछलियों को छनवाया। अब तक इस कुंड में करीब 20 क्विंटल से अधिक मछलियों की मौत होने का अनुमान है। मछलियों के मरने और कुंड में सड़न के चलते दुर्गध फैल गई है।
महावीर पंचांग के संपादक डॉ. रामेश्वर नाथ ओझा के अनुसार स्कंद पुराण के काशी खंड में ईश्वरगंगी कुंड को गंगा अवतरण से पहले का बताया गया है। इसीलिए इसे आदि गंगा की संज्ञा दी गई है। इस कुंड में स्नान गंगा के बराबर माना जाता है। लोग इस कुंड की मिट्टी और जल से शुभ कार्यों की शुरुआत करते हैं।