ठाकुर श्री गोपाल लाल जी और राधिका जी का यह विग्रह पहले उदयपुर के राणा वंश की एक वैष्णव महिला लाढ़ बाई के पास था। महाप्रभु वल्लभाचार्य के पौत्र गोकुल नाथ ने यह देव प्रतिमा उनसे लेकर सेवा शुरू की। विक्रम संवत 1787 में उनके वंशज गोस्वामी जीवन लाल महाराज विग्रह को काशी लेकर आए और उन्होंने चौखंभा में गोपाल मंदिर बनाकर इसकी स्थापना की। उनके वंशज आज भी अपने देवता की सेवा कर रहे हैं।
गोपाल मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण गोस्वामी जीवन लाल ने संवत 1834 में कराया था। यही वजह है कि मंदिर को जीवन लाल की हवेली भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में कमल तलैया और गोस्वामी मुरलीधर लाल के हाथों स्थापित शिलाओं पर ब्रज चौरासी कोस का प्रतिरूप एक बारादरी में विराजमान है। इसकी परिक्रमा यहां आने वाले वैष्णव करते हैं।
सेवा करने वाले हर बार पहनते हैं नया वस्त्र
मंदिर परिसर शुद्धता और पवित्रता का खास ध्यान रखा जाता है। गिरिधर महाराज ने मंदिर परिसर में शुद्धता और पवित्रता को विशेष अहमियत दी थी। ठाकुर जी को लगने वाला भोग मंदिर परिसर में ही बनाया जाता है। ठाकुर जी के सेवइत जिस वस्त्र को पहनकर सेवा करते हैं, उस वस्त्र को दोबारा नहीं पहनते हैं। भगवान के विग्रह को स्पर्श करने का अधिकार सिर्फ दो लोगों को ही है और वे गोस्वामी परिवार के ही हैं।
गोपाल मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। अर्धरात्रि भगवान के जन्म से शुरू होने वाला समारोह छठ तक चलता है। भगवान के दर्शन का समय महज 15 मिनट का होता है। सुबह मंगला, शृंगार, पालना और भोग के दर्शन होते हैं। इसके बाद मंदिर का पट बंद हो जाता है। शाम को उत्थापन के बाद होने वाली भोग आरती और शयन आरती को देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ होती है।