पहलवान सिमरन अपने पिता के साथ
- फोटो : अमर उजाला
पिता प्रदीप का कहना है कि गांव में उतनी सुविधा नहीं है। बेटी के ओलंपिक में जाने के सपने को पूरा करने के लिए अपना घर और काम सब छोड़ दिया। सिरसा से हिसार आ गया। गांव में बड़े भाई खेती कर रहे हैं और मैं बेटी को पहलवानी करा रहा हूं। सिगरन की मां सुमन उसके खाने पीने का ध्यान रखती हैं। सिमरन राष्ट्रीय फेडरेशन कप और रैंकिंग टूर्नामेंट के साथ अखिल भारतीय विश्वविद्यालय कुश्ती प्रतियोगिता में पदक जीत चुकी हैं।
अंकिता और संध्या बुआ-भतीजी हैं
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खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स में एमडीयू यूनिवर्सिटी अंकिता और संध्या बुआ-भतीजी हैं। बुआ अंकिता ने रजत और भतीजी ने कांस्य पदक हासिल कर देश का मान बढ़ाया। हरियाण के सोनीपत की महिला पहलवान की इस जोड़ी ने खेलो इंडिया गेम्स में काफी नाम कर लिया। वहीं जब घर में दो मेडल आए तो परिवार वाले भी खुशी से झूम उठे। साथ आए परिवार के सदस्यों की खुशी देखते ही बन रही हैं।
दोनों खिलाड़ियों ने पहली बार खेलो इंडिया में प्रतिभाग किया। इन महिला पहलवानों का कहना है कि लड़कियों का कुश्ती जैसे खेल में कॅरियर बनाना आसान नहीं होता। लेकिन जब आप मेडल लाते हैं तो लोग साथ देने लगते हैं। संध्या और अंकिता अब ओलंपिक में जाने की तैयारी में हैं।
दिल्ली की बिपाशा को शुरुआती दिनों में खूब ताने झेलने पड़े। जब बिपाशा ने कुश्ती के लिए अभ्यास शुरू किया तो पड़ोसी ताने देते थे कि लड़की अब अखाड़े में लड़कों के साथ उतरेगी। पुरुष कोच से प्रशिक्षण पर भी लोग सवाल उठाते थे। लेकिन बिपाशा के माता पिता ने उसका पूरा सहयोग किया।
बेटी ने भी तानों को तारीफ में बदलने की जो ठानी तो छह बार अंतरराष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर मेडल लगाया। अब वही पड़ोसी उसकी तारीफ करते नहीं थकते। बिपाशा का कहना है हर पहलवान का सपना ओलंपिक होता है। खेलो इंडिया से अवसर मिलने से ओलंपिक की राह आसान होगी। बिपाशा सोमवार को 76 किलोभार में होने वाली प्रतियोगिता में अपना दम दिखाने को तैयार हैं।