अदालत से अपील की गई थी कि संपूर्ण ज्ञानवापी परिसर तथा कथित विवादित स्थल के संबंध में भौतिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा रडार तकनीक से सर्वेक्षण तथा परिसर की खोदाई कराकर रिपोर्ट मंगाई जाए। वादमित्र ने भवन के बाहरी तथा अंदरूनी दीवारों, गुंबदों, तहखानों आदि के भी संबंध में एएसआई से निरीक्षण कराकर रिपोर्ट मंगाने की अपील की थी।
श्रीराम की तरह मुक्त होंगे आदि विश्वेश्वर
पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता और प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र विजय नाथ रस्तोगी ने बृहस्पतिवार को बताया कि न्यायालय के आदेश के बाद अब आदि विश्वेश्वर के मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। औरंगाबाद निवासी 67 वर्षीय विजय शंकर रस्तोगी ने कहा कि उनके सपने में लगभग चार दशक पहले भगवान विश्वेश्वर आए थे। उन्होंने सपने में ही काशी के कोतवाल कालभैरव से कहा था कि विवादित ढांचे के नीचे पड़े उनके ज्योतिर्लिंग को मुक्त कराएं।
इसके बाद वर्ष 1991 में ज्ञानवापी परिसर में मंदिर के जीर्णोद्धार और पूजापाठ के अधिकार के लिए मुकदमा दाखिल किया गया। उन्होंने कहा कि अयोध्या प्रकरण में भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को अदालत ने माना था। इसी वजह से उन्होंने अदालत से मांग की थी कि ज्ञानवापी परिसर का भी पुरातात्विक सर्वेक्षण करा कर उसका धार्मिक स्वरूप स्पष्ट किया जाए। अदालत में उनकी याचिका की पैरवी में अधिवक्ता राजेंद्र प्रताप पांडेय, अमरनाथ शर्मा, शिवानंद पांडेय और सुनील रस्तोगी आदि ने सहयोग किया। सभी लोग यह मान कर चलें कि वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित पुरातात्विक सर्वेक्षण में दूध का दूध और पानी का पानी स्पष्ट हो जाएगा। इसी के साथ ही ज्ञानवापी प्रकरण से जुड़ा विवाद भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
पूजापाठ, राग-भोग, दर्शन-पूजन का अधिकार
वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी की तरफ से वर्ष 1991 से लंबित मुकदमे में आवेदन देकर कहा गया कि मौजा शहर खास स्थित ज्ञानवापी परिसर के 9130, 9131, 9132 रकबा एक बीघा नौ बिस्वा जमीन का पुरातात्विक सर्वेक्षण करके यह बताया जाए कि जो जमीन है, वह मंदिर का अवशेष है या नहीं। साथ ही विवादित ढांचे का फर्श तोड़कर यह देखा जाए कि 100 फीट गहरा अरघा ज्योतिर्लिंग स्वयं भू विश्वेश्वर नाथ का परिलक्षित होता है या नहीं। दीवारें प्राचीन मंदिर की हैं या नहीं। 14वीं शताब्दी के मंदिर में प्रथम तल में ढांचा और भूतल में तहखाना है, जिसमें 100 फीट गहरा शिवलिंग है, यह खुदाई से स्पष्ट हो जाएगा। मंदिर का जीर्णोद्धार पहले 2050 विक्रमी संवत में राजा विक्रमादित्य ने, फिर सतयुग में राजा हरिश्चंद्र ने और वर्ष 1780 में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। यह भी कहा कि 100 वर्ष तक 1669 से 1780 तक मंदिर का अस्तित्व ही नहीं रहा।
विवादित ढांचा खोदे जाने से शांतिभंग
वहीं, सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधिवक्ता अभय नाथ यादव का कहना था कि दावे के अनुसार जब मंदिर तोड़ा गया, तब ज्योतिर्लिंग उसी स्थान पर मौजूद था जहां आज है। उसी दौरान राजा अकबर के वित्तमंत्री टोडरमल की मदद से नरायन भट्ट ने मंदिर बनवाया था, जो उसी ज्योतिर्लिंग पर बना है। ऐसे में विवादित ढांचा के नीचे दूसरा शिवलिंग कैसे आया। इसे देखते हुए खोदाई नहीं होनी चाहिए।
रामजन्म भूमि की तरह पुरातात्विक रिपोर्ट मंगाए जाने पर कहा कि स्थितियां विपरीत हैं। वहां साक्षियों के बयान के बाद विरोधाभास होने पर कोर्ट ने रिपोर्ट मंगाई थी, जबकि यहां के मामले में अभी तक किसी का साक्ष्य हुआ ही नहीं है। ऐसे में साक्ष्य आने के बाद विरोधाभास होने पर कोर्ट रिपोर्ट मंगा सकती है। दलील दी गई कि साक्ष्य एकत्र करने के लिए रिपोर्ट नही मंगाई जा सकती है।
यह भी कहा गया कि विवादित ढांचा खोदे जाने से शांतिभंग भी हो सकती है, ऐसे में कोर्ट का दायित्व है कि वहां शांति बनी रहे। अदालत में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की तरफ से रईस अहमद खान, अफताब अहमद, मुमताज अहमद और सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से तौफीक खान ने भी दलीलें पेश की थीं।