काशी में गंगा के किनारे जैन धर्म के चार तीर्थंकरों का जन्म हुआ है। यह जैन धर्मावलंबियों के लिए चार कल्याणक की भूमि है। इसमें गर्भ, जन्म, तप और ज्ञान कल्याणक हैं। चार कल्याणक भूमि होेने के कारण जैन धर्मावलंबियों के लिए काशी का बहुत महत्व है। वर्तमान में चातुर्मास के दौरान ही 10 सितंबर से दशलक्षण महापर्व की शुरुआत होगी।
चातुर्मास में सभी जैन संत अपनी यात्रा रोक देते हैं और मंदिर, आश्रम या संत निवास पर ही रहकर यम और नियम का पालन करते हैं। जैन धर्म के अनुसार यह चार माह व्रत, साधना और तप के रहते हैं। इस दौरान सख्त नियमों का पालन करना चाहिए। जैन मुनि विशदसागर महाराज चातुर्मास के लिए काशी प्रवास कर रहे हैं। दशलक्षण महापर्व 10 सितंबर से 19 सितंबर तक मनाया जाएगा। पिछले साल कोरोना संक्रमण के कारण दशलक्षण पर्व का आयोजन घरों में ही किया गया था। जैन समाज के सुरेंद्र जैन ने बताया कि चातुर्मास जैन धर्म में आत्म आराधना का पर्व है। डॉ. संजीव सर्राफ ने बताया कि जैन धर्म में हिंसा के साथ-साथ भाव हिंसा को भी स्थान दिया गया है अत: किसी के बारे में गलत सोचना भी हिंसा की श्रेणी में आता है।
मनाया जाता है पर्युषण पर्व
सुरेंद्र जैन ने बताया कि चातुर्मास में ही जैन धर्म का सबसे प्रमुख पर्व पर्युषण पर्व मनाया जाता है। यदि वर्षभर जो विशेष परंपरा, व्रत आदि का पालन नहीं कर पाते वे इन आठ दिनों के पर्युषण पर्व में रात्रि भोजन का त्याग, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, जप-तप मांगलिक प्रवचनों का लाभ तथा साधु-संतों की सेवा में संलिप्त रहकर जीवन सफल करने की मंगलकामना कर सकते हैं।