गंगा में मूर्ति विसर्जन पर शास्त्रोक्त समाधान के लिए काशी में जल्द ही ‘धर्म संसद’ बुलाई जाएगी। इसमें देश भर के धर्माचार्य, संत, पर्यावरणविद् और विद्वान शामिल होंगे। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार इस ‘धर्म संसद’ में विसर्जन पर फैसला लिया जाएगा। विसर्जन के सवाल पर श्री विद्यामठ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा। यह जानकारी गुरुवार को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने पत्रकारों से बातचीत में दी।
केदारघाट स्थित विद्यामठ में गुरुवार की शाम पत्रकारों से बातचीत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि मूर्ति विसर्जन और अविरल गंगा के सवाल पर धर्म संसद में चर्चा कराई जाएगी। काशी में होने वाली इस धर्म संसद की तिथि ज्योतिष, द्वारका-शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से वार्ता कर जल्द ही तय की जाएगी। अन्याय प्रतिकार यात्रा के दौरान गोदौलिया चौराहे पर हुए बवाल में नामजदगी के बाद पहली बार मीडिया से रूबरू स्वामी ने कहा कि मूर्ति विसर्जन के मसले पर शासन-प्रशासन
को समझना होगा कि सनातन धर्म अपने धर्मशास्त्र से ही निर्देशित होता है। मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा का विधान और पूजा की पद्धति के बारे में धर्मशास्त्र ही हमें बताता है। देश के हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता संविधान में दी गई है। जबकि मूर्ति विसर्जन के संबंध में उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए बीते दिनों वाराणसी के जिला प्रशासन ने गणेश प्रतिमा के विसर्जन से भक्तों को रोक दिया था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने उच्च न्यायालय के आदेश को समझने पर जोर दिया। कहा कि न्यायालय
का आदेश गंगा को प्रदूषित करने से रोकना हो सकता है लेकिन हमारी परंपराओं को रोकना कदापि नहीं हो सकता। ऐसे में प्रशासन को विद्वानों, न्यायविदों के साथ मिलकर इस संबंध में रास्ता निकालना चाहिए। ताकि न्यायालय की अवमानना भी न हो और सनातनधर्मी अपने विधि-विधान भी पूरा कर सकें। उन्होंने बताया कि वह खुद इस मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय जाएंगे।