काशी गुरुवार की शाम दीपमालाओं, पंक्तिबद्ध ज्योति कतारों से जगमग हो उठी। गंगा तट से लेकर शहर के हर गली, चौराहे तक हर तरफ दीपों की लड़ियां गूंथी गईं। भवनों के द्वारों से लेकर आंगन तक रंग-बिरंगे पुष्पों के वंदनवार लटकने लगे।
अस्सी घाट पर सांझ ढलते ही जहां दीपदान के लिए बच्चे, महिलाएं और युवा उमड़ पड़े, वहीं दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती ज्योति पर्व के नाम समर्पित की गई। पर्यटकों, श्रद्धालुओं ने भी घाटों पर भीतर से बाहर तक के तम को दूर करने के लिए तीर्थ नगरी में दीये जलाकर तमसो मां ज्योर्तिगमय... का संदेश दिया।
ज्योति पर्व पर कोई गरीबों के बीच झोपड़पट्टी में दीप जलाने, खुशियां लुटाने पहुंचा तो कोई वृद्धाश्रमों में अनाथों के बीच। शहर के मॉल, भवनों, इमारतों और प्रतिष्ठानों की छटा डिजाइनर झालरों की चकाचौंध से बदल गई। दीपावली की छटा शाम होने के साथ ही गंगा तटों पर देखते बनी।
महिलाएं, बच्चे थालियों में दीप सजाकर घाटों की सीढ़ियां उतरने लगे। मंदिरों में हर छोटे-बड़े शिवलिंग, प्रतिमाओं के पास दीप जलाए गए। कुछ लोग नावों, बजड़ों से दीप गंगा की लहरों पर प्रज्ज्वलित कर छोड़ते रहे।
गोरी केदारेश्वर महादेव मंदिर के अलावा तिलभांडेश्वर, मंगलागौरी, महामृत्युंजय महादेव समेत अन्य मंदिरों, तीर्थों में दीपदान के लिए भीड़ लगी रही। लहरों पर पंक्तिबद्ध दीपों की कतारें अलग आभा मंडल की रचना कर रही थीं।
तमाम बहिष्कार के नारों के बावजूद चाइनीज झालरों से लोगों को मोहभंग नहीं हुआ। हालांकि कुछ स्थानों पर देसी झालरों और मिट्टी के डिजाइनर दीयों की भी सजावट खास रही।