कजरी कार्यशाला का समापन कार्यक्रम
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गंगा की लहरों पर कजरी कार्यशाला में मालिनी के सुरों में अवधी का कलरव सुनाई पड़ा। माई विंध्याचल के महिमा अपार बा, ऊंचा दरबार बा ना... पर महिला दर्शक गंगोत्री क्रूज के डेक पर ही झूमने-नाचने लगीं। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने गुरु पूर्णिमा पर 55 शिष्यों को कोरस बनाकर लोक सुरों की दीक्षा दी, तो वहीं अपनी गुरुमाता स्वर्गीय पद्म विभूषण गिरिजा देवी को गुरु दक्षिणा दी। इसी के साथ पांच दिन की व्यावहारिक सुर साधना की कक्षा भी पूरी हो गई।
बुधवार को रविदास घाट पर रिमझिम बरसे बदरिया... की थीम पर चल रही कजरी कार्यशाला के पांचवें दिन मिर्जापुर, अहिरौरा, सोनभद्र, चुनार के गांवों में गाई जाने वाली कजरी, दादरा, ठुमरी, झूला गीतों के बाद लखनऊ, सीतापुर, उन्नाव और प्रतापगढ़ के तराने भी सुनने को मिले। युवा संगीतकारों को उन्होंने कई नई विधाओं से परिचय कराया।
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर...
झूला धीरे से झूला ओ बनवारी अरे सवारियां... झूला गाकर युवा कलाकारों के सुरों का परीक्षण किया। अब बरखा बहार के आई गईले ना माई विंध्याचल... गीत पर महिलाएं अपने आप को नृत्य करने से नहीं रोक पायीं। धीमे स्वर में अवधी गीत निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर, आई सावन की बाहर रे... गाकर भी दर्शकों को मुग्ध कर दिया। क्रूज पर सुर की क्लास लगाते हुए मालिनी अवस्थी ने कहा कि इन गीतों का जन्म आपके आसपास ही हुआ है।