परतदार चट्टानों के बीच मिलने वाले चूना पत्थरों को सफेद रंग बनाने के काम में लिया जाता था। इन रंगों का उपयोग आधुनिक मानव समाज के पूर्वज घरों के रंग-रोगन और आयोजन विशेष पर चित्रकारी में करते थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एक शोध में इस दुर्लभ जानकारी का पता चला है।
कैमूर पर्वत शृंखला के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली और बिहार के अधौरा इलाके में शैल गुफाओं के वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान पता चला है कि इन क्षेत्रों में रहने वाली ओरांव, गोंड, बैगा आदि जनजातियों के यहां आधुनिक चित्रकारी परंपरा में आज भी कैमूर पर्वत शृंखला में पाई जाने वाली लाल, पीली और सफेद मिट्टियों का प्रयोग किया जाता है, जो इन्हीं पत्थरों से बनाई जाती हैं। हालांकि इनकी संख्या अब सीमित हो चुकी है।
बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सचिन कुमार तिवारी और उनकी टीम ने शैल गुफाओं की दीवारों पर हुई चित्रकारी का अध्ययन किया। परतदार चट्टानी इलाके में हेमेटाइट और लैटेराइट पत्थरों की मौजूदगी का पता चलने के बाद शोध टीम की उत्सुकता बढ़ गई।
इनके अध्ययन से पता चला कि प्राचीन काल में हेमेटाइट पत्थरों के टुकड़ों को पीसकर लोग लाल और पीला रंग बनाते थे। उनकी मान्यता थी कि हेमेटाइट से पुती दीवारों पर कीड़े नहीं आते। कालिख से काला रंग बनाकर चित्रकारी के साथ काजल बनाने के काम में लिया जाता था। पुराने चित्रों में रंगों से कुसुम (सफ्लावर) बनाने के साक्ष्य भी मिले हैं।
इससे पता चलता है कि दो हजार साल पुरानी सभ्यता में कुसुम का खास महत्व रहा होगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर से वित्तपोषित शोध अध्ययन में डॉ. तिवारी के साथ धरनी कुमार, आनिंद्य सान्याल, प्रकृति और नीलम सिंह जुटी हैं।
पांच कारणों से मर रही प्राचीन परंपरा
हेमेटाइट और लैटेराइट पत्थरों की पहचान कर उनसे रंग बनाने की परंपरा विलुप्त के कगार पर है। डॉ. सचिन तिवारी इसके पीछे पांच कारण बताते हैं। पहला कारण आर्थिक है। कैमूर के जनजातीय इलाकों के लोग बताते हैं कि जितनी कड़ी मेहनत वे करके रंगों को खोजते हैं, फिर चित्रकारी करते हैं, उतनी मेहनत में कोई रोजगार कर लेंगे।
दूसरा कारण आधुनिकीकरण है। मिट्टी की दीवारों के बाहर चित्रकारी को पिछड़ापन माना जाने लगा है। तीसरा कारण सरकारी योजनाओं के तहत मकान पक्के होते जा रहे हैं। चौथा, बाजार में आसानी से डिब्बाबंद रंग उपलब्ध हो गए हैं। जंगल पर जनजातियों की आजीविका निर्भर थी, लेकिन पेड़ काटने, जीव जंतुओं के शिकार आदि पर प्रतिबंध लगने के कारण इस पर प्रभाव पड़ा है।