संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, रक्षा, तरक्की, स्वास्थ्य और खुशहाली के लिए माताओं ने जीवित्पुत्रिका का पूजन किया। गंगा के घाट से लेकर शहर के कुंड और तालाबों पर सुबह से ही पूजन के लिए आने वालों का तांता लगा रहा। व्रती महिलाओं ने सप्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सात निशान बनाकर उस पर सात बार सिंदूर का टीका भी लगाया।
बुधवार को घाट, कुंड और तालाबों पर नंगे पांव प्रसाद के थाल लेकर महिलाओं के पहुंचने का सिलसिला देर शाम तक जारी रहा। शहर से लेकर गांव तक यह नजारा आम था। कुंड और घाट के किनारे समूह में एकत्रित महिलाओं ने सबसे पहले गोमय-मिट्टी तथा कुश से शालिवाहन राजा के पुत्र जीमूतवाहन की प्रतिमा के बाद गोमय व मिट्टी से सियारिन व चूल्होरिन की प्रतिमा बनाकर पूजन आरंभ किया। ऐपन से सात बार निशान बनाकर उस पर सात बार सिंदूर का टीका लगाया। इसके बाद धूप व दीप दिखाने के बाद माता को सात प्रकार के फल और व्यंजन भी अर्पित किया।
शहर के कुंडों का नजारा ही एकदम अलग था। जिनके घर में विवाह हुआ था वह लोग नवदंपती के साथ ढोल नगाड़ों के साथ पहुंचे। गन्ने का मंडप बनाकर विधि-विधान से जीवित्पुत्रिका का पूजन किया और गोठ (महिलाओं का समूह) में बैठकर कथा सुनी। माता से नवविवाहित जोड़ों के सुखद जीवन व संतान प्राप्ति की कामना की। दशाश्वमेध घाट, राजघाट, अस्सी समेत सभी प्रमुख घाटों पर पूजन करने वालों की भीड़ रही।उधर, रामनगर, मिर्जामुराद, रोहनिया, पिंडरा और शिवपुर समेत सभी ग्रामीण क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ महिलाओं ने व्रत किया। विधि विधान से पूजा अर्चना की और कथा श्रवण किया। अपने संतान के दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना की।