आजादी के पहले काशी में 15 सिंधी परिवारों से काशी में झूलेलाल के अवतरण दिवस पर पूजा शुरू हुई। लेकिन, देश के बंटवारे के बाद काशी आए 700 सिंधी समाज के लोगों ने इस उत्सव को भव्य आकार दिया। 64 सालों से समाज के लोग संगठित रूप में अपने इष्टदेव की आराधना कर रहे हैं।
चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को झूलेलाल का अवतरण दिवस मनाया जाता है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में जन्म लेने वाले झूलेलाल को सिंधी समाज के लोग वरुण देव का स्वरूप मानते हैं। काशी में उनके अवतरण दिवस का पर्व आजादी के पहले से मनाया जाता रहा है। सिंधी समाज के जानकार रमेश लखवानी ने बताया कि आजादी के पहले करीब 15 परिवार बनारस में रहते थे। उस वक्त वे अपने घरों में ही झूलेलाल जयंती मनाते थे। मगर, बंटवारे के बाद 700 से अधिक लोगों ने काशी का रुख किया।
सामूहिक संगठन के रूप में 1960 में पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत का गठन भगत बालचंद्र मंगनानी ने किया। तब रामापुरा स्थित शंकर सत्संग भवन झूलेलाल की जयंती मनाई जाती थी और शोभायात्रा बेनियाबाग, मैदागिन, चौक होकर दशाश्वमेध घाट तक जाती थी। उन्होंने बताया कि समाज के लोगों की मदद से 1957 में लक्सा में जमीन ली गई।
1982 में झूलेलाल मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, जिसका विधिवत उद्घाटन 1986 में हुआ। इसके बाद से सभी कार्यक्रम यहीं पर होते हैं। पूज्य सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष ओपी बदलानी ने बताया कि यह संगठन 23 वार्डों, चार धार्मिक और चार सामाजिक संस्थाओं को मिलाकर बनाया गया है। वार्ड मुखिया छोटी-मोटी समस्याओं को निपटाने के अलावा उनके सुख-दुख में भागीदारी करते हैं।