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बिना अधीक्षक की जिला जेल में निरुद्ध हैं क्षमता से दोगुने बंदी

Sun, 04 Feb 2018 11:40 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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वाराणसी जिला कारागार - फोटो : file photo
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वाराणसी जिला कारागार में दो अप्रैल, 2016 को बंदियों ने जेल अधीक्षक को बंधक बनाकर साढ़े सात घंटे तक हिंसक उपद्रव किया था। शनिवार को मोबाइल मिलने की घटना के समय 747 बंदियों की क्षमता वाले जिला जेल में 1920 बंदी कैद थे।
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जिनमें से नक्सल प्रभावित चंदौली जिले के बंदी और गुड्डू मामा जैसे पूर्वांचल के खतरनाक शॉर्प शूटर भी शामिल हैं। पूर्वांचल की ऐसी संवेदनशील जेल पिछले छह महीने से बगैर कारागार अधीक्षक के ही चल रही है।

वहीं, बंदीरक्षकों सहित अन्य स्टाफ की भी जिला जेल में भारी कमी है। इन हालात में सहज जायजा लगाया जा सकता है कि जिला जेल की मौजूद स्थिति कैसी है। जिला जेल में वर्ष 2016 में हुए बवाल के दौरान फूंके गए सीसीटीवी कैमरे आज तक दुरुस्त नहीं किए जा सके हैं और शोपीस बने हुए हैं।
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यहां लगे जैमर सिर्फ 2-जी मोबाइल की बातचीत पर ही अंकुश लगाने तक सीमित है। इसके चलते बंदीरक्षकों और जेल अधिकारियों की मिलीभगत से बंदी 3-जी और 4-जी मोबाइल से बातचीत करते हैं।

जैमर को अपडेट करने का प्रस्ताव कारागार प्रशासन की ओर से भेजा गया लेकिन शासन स्तर से इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई। वहीं, 747 बंदियों की क्षमता के अनुसार जेल में 80 बंदीरक्षक होने चाहिए लेकिन सिर्फ 67 तैनात हैं।

डिप्टी जेलर के छह में से दो पद खाली हैं। इस संबंध में जिला जेल के प्रभारी अधीक्षक अंबरीष गौड़ ने कहा कि सीसीटीवी, जैमर और कर्मचारियों के खाली पदों के संबंध में आला अधिकारियों को जानकारी भेजी गई है। इन सभी के संबंध में शासन स्तर से ही निर्णय होना है। 

ना जेलर सीनियर नजर आए और ना बंदीरक्षक जूनियर

जेल के बाहर तैनात पुलिस - फोटो : File Photo

जिला जेल के भीतर शनिवार को जेलर और बंदीरक्षकों के एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप को देख पुलिस और प्रशासन के अधिकारी हतप्रभ थे। दो बंदीरक्षक तो कारागार के गेट से बाहर निकल कर मीडिया के सामने बोले कि जेलर के कारण बंदी मोबाइल उपयोग करते हैं।

सब पैसे का खेल है और खेल पकड़ने पर हम लोगों को गाली दी जाती है। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों ने जेल से बाहर निकलने के बाद बताया कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जेलर वरिष्ठ अधिकारी और बंदीरक्षक मातहत कर्मचारी ही नहीं हैं। अनुशासन और लिहाज दूर-दूर तक नहीं दिखा।

दोनों पक्ष एक-दूसरे पर बंदियों से मिलीभगत का खुल्लमखुल्ला आरोप लगा रहे थे। जेलर और बंदीरक्षकों के बीच खाई सी खिंच गई है। जेल में अधीक्षक की तैनाती बहुत जरूरी है। बंदीरक्षकों और जेलर के बीच हुई नोकझोंक पर जिलाधिकारी की भी नजर है।

माना जा रहा है कि एलआईयू की रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। वहीं, प्रभारी अधीक्षक ने जेलर और बंदीरक्षकों को जमकर फटकार लगाई। कहा कि जेलर और बंदीरक्षक दोनों समझ लें, अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिला जेल के बंदियों से मोबाइल बरामद होना कोई नहीं बात नहीं है।

इससे पहले नवंबर 2017 में 10 दिन के भीतर दो बंदियों से दो मोबाइल बरामद हुए थे। 11 अप्रैल 2017 को एसटीएफ ने बंदीरक्षक शिव कुमार सोनकर की मदद से शामली निवासी कुख्यात सागर मलिक की मोबाइल से बातचीत का खेल उजागर किया था। इससे पहले अप्रैल 2016 में हुए हिंसक उपद्रव के पीछे की ठोस वजह भी मोबाइल से बंदियों की बातचीत पर की गई सख्ती थी। 
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मोबाइल से गुर्गों को निर्देश, वारदातों की रचते हैं साजिश

ज‌िला जेल - फोटो : file photo
जेल में निरुद्ध अपराधी मोबाइल फोन के जरिये जरायम जगत में अपनी धमक बनाए रखते हैं। मोबाइल से अपने गुर्गों को निर्देश देने के साथ ही वारदातों की साजिश रचना भी उनके लिए बेहद आसान हो जाता है।

ऐसे एक नहीं कई मामले सामने हैं जब वारदातों की साजिश जेल से रचने का पुलिस ने खुलासा किया लेकिन कारागार प्रशासन इस संबंध में कभी गंभीर नहीं हुआ। चंदौली के अलीनगर निवासी जिस आबिद सिद्दीकी से मोबाइल बरामद हुआ है वो फरार रईस बनारसी का बेहद करीबी है।

बीते साल अक्तूबर में इनामी गुड्डू मामा के साथ आबिद सिद्दीकी गिरफ्तार हुआ था। दोनों सपा नेता विजय जायसवाल के घर अंधाधुंध फायरिंग और उनके कर्मचारी के भाई की हत्या करने के बाद भाग रहे थे।

जिला जेल के जेलर ने बताया कि गाजीपुर के बहरियाबाद क्षेत्र के जिस आशुतोष सिंह के पास से मोबाइल बरामद हुआ है, वह बीएचयू का निष्काषित छात्र है। आशुतोष बीएचयू में ठेकेदार से रंगदारी मांगने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।।

भदोही के गोपीगंज का राजीव पांडेय डिप्टी जेलर अनिल त्यागी हत्याकांड का आरोपी है। इसके अलावा मिर्जापुर के चुनार के अतुल सिंह और रोहनिया के तिलंगा के विवेक सिंह के पास से मोबाइल बरामद हुआ है। दोनों अभी जरायम जगत में पैठ बनाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

जानकारों के अनुसार 20 से 30 हजार रुपये खर्च कर बंदीरक्षकों और जेल अधिकारियों की मदद से बंदी अपने पास मोबाइल मंगवा लेते हैं। एक मोबाइल को पीसीओ की तरह कई बंदी इस्तेमाल करते हैं। बात कराने के लिए एक कॉल का मनमाफिक दाम वसूला जाता है।

मोबाइल को बैरकों में दीवार की दरारों के बीच, जमीन के नीचे या मैदान में छुपाया जाता है। इस संबंध में एसपी सिटी दिनेश कुमार सिंह ने कहा कि जो सात मोबाइल बरामद हुए हैं उनकी कॉल डिटेल खंगाली जाएगी और तस्दीक की जाएगी कि कहां व किससे बातचीत हुई है। इसके आधार पर पुलिस आगे की कार्रवाई करेगी।
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