गंगा सागर, प्रयाग और दशाश्वमेध स्नान के बराबर मिलता है पुण्य
श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 800 मीटर दूर पांडेय हवेली में तिलभांडेश्वर महादेव विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में बाबा का विशाल शिवलिंग है।
मान्यता है कि भगवान तिलभांडेश्वर का आकार सावन के प्रदोष पर तिल भर बढ़ता है। इसलिए इन्हें तिलभांडेश्वर महादेव कहा जाता है। गंगा सागर में बार-बार स्नान, प्रयाग संगम में स्नान और काशी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करने से जो पुण्य की प्राप्ति होती है, उस पुण्य की प्राप्ति केवल एक बार तिलभांडेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से हो जाती है।
तिलभांडेश्वर महादेव की उत्पत्ति के बारे में काशी के विद्वानों का कहना है कि शिवलिंग अनादिकाल से विद्यमान है। पुराणों के अनुसार स्वयंभू तिलभांडेश्वर महान ऋषि विभांड की तपोस्थली है। ऋषि विभांड यहीं पर पूजन-अर्चन, अनुष्ठान और साधना करते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनको वरदान दिया कि यह सिद्ध शिवलिंग कलयुग पर्यंत सावन के प्रदोष पर एक तिल के बराबर बढ़ेंगे।