गंगा पार बनाई गई थी नहर
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एनजीटी की चार सदस्यीय पीठ के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता में जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस अरुण कुमार त्यागी और डॉ. ऐ सेंथिल वेल ने रविवार को केंद्र और राज्य सरकार को एनएमसीजी के समन्वय से नदियों में सिल्ट के निस्तारण के लिए तीन महीने के अंदर विशेषज्ञों की टीम गठित करने का आदेश दिया है।
आदेश में कहा गया कि एनएमसीजी देश भर की नदियों में ड्रेजिंग की नियमावली एक माह के अंदर तैयार करे। जो नियमावली बने, उसे एनएमसीजी की वेबसाइट उपलब्ध कराई जाए। इसका विभिन्न माध्यमों से प्रचार भी किया जाए। एनजीटी ने विशेषज्ञों के निर्देश पर सिल्ट निस्तारण की कार्ययोजना तैयार करने के आदेश भी दिए।
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गंगा पार नहर खोदाई के मामले में एनजीटी के सख्त रुख से सिंचाई विभाग ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और कहा कि उसने जानबूझकर ऐसी गड़बड़ी नहीं की है। सुनवाई के दौरान सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव की तरफ से वकील ने कहा कि हमें तो यह जानकारी ही नहीं थी कि ड्रेजिंग के लिए एनएमसीजी की अनुमति लेनी होगी। हमने यह काम भरोसे में किया था। हमें यह भी नहीं पता था कि ड्रेजिंग मैटेरियल को बेचा नहीं जा सकता है। हमने जानबूझकर गलती नहीं की है। फिलहाल, एनजीटी ने सुनवाई के बाद आदेश देते हुए कहा है कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता की तरफ से वकील सौरभ तिवारी ने तर्क दिया कि गंगा पार रेती पर अवैध खनन किया गया था और बाढ़ में वह बह भी गया। इसके बाद भी खोदाई की गई और उसे बेचा गया। इसके लिए एनएमसीजी की ओर से कोई अनुमति नहीं ली गई।
नहीं मानी थी विशेषज्ञों की सलाह
गंगा पार रेती पर जब नहर बनवाने का फैसला हुआ तो नदी वैज्ञानिक प्रो. यूके चौधरी, प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र व प्रो बीडी त्रिपाठी ने सवाल उठाए और कहा था कि जलस्तर बढ़ने के साथ ही नहर का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। करोड़ों रुपये बेकार हो जाएंगे। जैसे ही नदी का जलस्तर बढ़ा, वैसे ही नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। अगर वैज्ञानिकों की सलाह मानते तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता था।
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सिंचाई विभाग ने तीन फरवरी 2021 को अस्सी व राजघाट पर पानी का दबाव कम करने के लिए जेसीबी व पोकलैंड के जरिये नहर का निर्माण कराया था इसमें ड्रेजिंग का सहारा लिया गया और 5.3 किलोमीटर लंबी नहर बना दी गई। नहर निर्माण पर 11.95 करोड़ से ज्यादा की धनराशि खर्च की गई। इस बीच गंगा का जलस्तर बढ़ा और नवनिर्मित नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। पूरी नहर गंगा की गोद में समा गई। इससे विवाद बढ़ा और मामला एनजीटी तक पहुंच गया। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय ने पांच जनवरी 2023 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष जो जवाब दाखिल किया था, उसमें साफ कहा था कि नमामि गंगे और राज्य पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण से गंगा पार रेती पर नहर खोदाई की अनुमति नहीं ली गई थी।