कंचे खेलो तो भी ऐसे कि वाहवाही मिले, पतंगबाजी करो तो भी ऐसी कि सबसे आगे रहो, पढ़ाई करो तो भी सबसे अव्वल रहो... यही मेरी जिंदगी का फलसफा है। जीवन के प्रति मेरी अपनी दृष्टि है, वह है परफेक्शन... पूर्णता...। यह कहना है बॉलीवुड के ख्यात अभिनेता गोविंद नामदेव का। ठाकुर बन स्क्रीन पर सितम और पुजारी बन पर्दे पर पाखंड यानी जैसा किरदार वैसा अवतार।
सौ से अधिक फिल्मों में अपने अभिनय के दम पर विलेन का ‘स्टारडम’ जीने वाले नामदेव फिर भी कहते हैं, ‘रील लाइफ तो महज एक छलावा है, जो सामने है वही सत्य है, वही पूर्ण है...।’ मध्य प्रदेश के सागर के रहने वाले गोविंद फिल्म इंडस्ट्री के उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं, जिनकी अपनी गाढ़ी सोच है, समृद्ध विचारधारा है, अपने सिद्धांत हैं।
नामी पहलवान पिता रामप्रसाद नामदेव के बेटे 67 वर्षीय नामदेव चांदपुर स्थित कार्यालय में ‘अमर उजाला संवाद’ में उपस्थित हुए। इस दौरान अनुपम निशांत और उत्पल कांत पांडेय से हुई बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं...।
अस्सी-नब्बे के दशक का सिनेमा और आज का सिनेमा, क्या अंतर महसूस करते हैं आप?
बहुत कुछ बदल गया है। फिल्में बनाने के तरीके से लेकर कहानियों तक। आज रियलिस्टिक फिल्में बन रही हैं। आम आदमी की जिंदगी से जुड़े यथार्थ को सिनेमा उसी रूप में दिखा रहा है और दर्शक इसे पसंद भी कर रहे हैं। हमारी फिल्म इंडस्ट्री में अब विश्वस्तरीय फिल्में बन रही हैं। संजय लीला भंसाली जैसे निर्देशक और राजकुमार राव जैसे युवा ऊर्जावान फिल्मकार नई ऊंचाइयां दे रहे हैं।
तकनीक के साथ-साथ फिल्मों के स्वरूप में क्या बदलाव आया है?
फिल्मों में जो बदलाव आया है वह बेहद सुखद और सकारात्मक तो है ही रचनात्मकता का दायरा भी बढ़ गया है। आज हर तरह की फिल्में बन रही हैं। आज की फिल्मों में केवल हीरो, हीरोइन और विलेन नहीं रहे गए। अलग-अलग थीम पर बेहतरीन और विविधता वाली फिल्में कम बजट में भी बन रही हैं। आज कोई भी फिल्म बना सकता है। फिल्म बनाने के लिए किसी बड़े बैनर का होना जरूरी नहीं रह गया।
क्या सोशल मीडिया फिल्मों को प्रभावित कर रहा है?
सोशल मीडिया ने तो फिल्मों की राह और आसान कर दी है। इसका दायरा बड़ा है। फिल्मों का प्रचार-प्रसार बैठे-बैठे हो जाता है। छोटे बैनर की फिल्में या कम लागत की फिल्मों की भी जानकारी आज लोगों को सोशल मीडिया के सहारे हो जाती है। पहले ऐसा नहीं था। छोटी बजट की फिल्मों के बारे में कोई नहीं जान पाता था।