युद्ध के उस माहौल में जब सीमा पर सैनिक लोहा ले रहे थे, तब देश के भीतर शहरों में ब्लैकआउट और सायरन की आवाजें आम थीं। लोग रेडियो से चिपके रहते थे ताकि युद्ध की पल-पल की खबर जान सकें। उस समय झूठी अफवाहें फैलाने वाले लोग कम थे। इंटरनेट और टेलीविजन का अभाव था, लेकिन फिर भी कुछ अफवाहें तेजी से फैल जाती थीं और लोग उन पर विश्वास भी कर लेते थे, हालांकि वे सच्चाई से कोसों दूर होती थीं।
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इसी युद्ध में शामिल रहे एक और वीर, इमलिया निवासी लांस नायक गौरी शंकर सिंह (75 वर्ष) हैं, जो बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप का हिस्सा थे। उन्हें भी युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए पांच मेडलों से नवाजा गया है। आज वे भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और देश की रक्षा करने के लिए आज भी तैयार हैं। उन्होंने भी उस दिन को याद किया और बताया कि कैसे कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में भारत जीता।
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जब इन दोनों लोगों से ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बात की गई, तो उन्होंने अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा, मेरा देश और मेरी सेना हम लोगों के समय से काफी विकास किया है, जिसके कारण सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर दोनों सफल हुए। यह मेरे देश के लिए बड़े गौरव और प्रसन्नता की बात है। अब सेना में पहले से बहुत विकास हुआ है। उनके ये शब्द न केवल उनके अनुभव को दर्शाते हैं बल्कि भारतीय सेना की आधुनिक क्षमताओं पर उनके गर्व को भी रेखांकित करते हैं।