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यादें: 1971 में भी गूंजा था सायरन, काशी के छह जवानों ने लिया था लोहा; वीर सपूतों ने सुनाई वीरता की दास्तां

Thu, 08 May 2025 03:10 PM IST
प्रगति चंद अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: 1971 में भी सायरन गूंजा था। काशी के छह जवानों ने लोहा लिया था। पूर्वांचल के 30 जवानों ने दुश्मनों को चटाई धूल थी। 54 साल पहले भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ था।  
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गौरी शंकर सिंह, देवनाथ मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध 1971 में हुआ था। इसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को धूल चटाई थी। इसकी शौर्यगाथा आज भी लोगों को प्रेरणा देती है। इस युद्ध में पूर्वांचल की धरती के 30 से अधिक जांबाजों ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया था। इनमें से छह वीर वाराणसी के चोलापुर के आसपास के गांव के थे। इन्हीं योद्धाओं में से एक रि. सूबेदार मेजर देव नाथ प्रसाद (76 वर्ष) और लांस नायक गौरी शंकर सिंह (75 वर्ष) ने उस ऐतिहासिक संघर्ष की स्मृतियों को साझा किया, जो छम्ब सेक्टर 410 मेडिकल बटालियन का हिस्सा थे। उन्हें भी युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए छह मेडलों से नवाजा गया है। इनके साथ ही सूबेदार जयशंकर सिंह, नायक राम प्रसाद यादव, नायक धर्मनाथ यादव और मेंस नायक राजबली राजभर ने भी पाकिस्तान से लोहा लिया था।

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रि. सूबेदार मेजर देव नाथ प्रसाद ने युद्ध के उन भयावह दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएं आमने-सामने थीं और भीषण संघर्ष जारी था। उनकी भूमिका युद्धभूमि में घायल हो रहे सैनिकों की चिकित्सा करने की थी। वे बताते हैं, सबसे भयावह स्थिति तब होती थी जब सैनिकों के सीने में गोली लगी होती थी और वे इलाज के लिए आते थे। 

देव नाथ प्रसाद बताते हैं कि सैनिक अपने परिवार वालों से भी बात नहीं कर पाते थे, जिससे परिजनों की चिंता बढ़ जाती थी। परिवार भगवान से यही दुआ करते थे, सभी सही रहें और भारत जीत जाए। मीडिया का प्रभाव भी आज जैसा नहीं था, जिस कारण सीमा पर घट रही घटनाओं की जानकारी आम लोगों तक आसानी से नहीं पहुंच पाती थी। 

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युद्ध के उस माहौल में जब सीमा पर सैनिक लोहा ले रहे थे, तब देश के भीतर शहरों में ब्लैकआउट और सायरन की आवाजें आम थीं। लोग रेडियो से चिपके रहते थे ताकि युद्ध की पल-पल की खबर जान सकें। उस समय झूठी अफवाहें फैलाने वाले लोग कम थे। इंटरनेट और टेलीविजन का अभाव था, लेकिन फिर भी कुछ अफवाहें तेजी से फैल जाती थीं और लोग उन पर विश्वास भी कर लेते थे, हालांकि वे सच्चाई से कोसों दूर होती थीं।

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इसी युद्ध में शामिल रहे एक और वीर, इमलिया निवासी लांस नायक गौरी शंकर सिंह (75 वर्ष) हैं, जो बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप का हिस्सा थे। उन्हें भी युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए पांच मेडलों से नवाजा गया है। आज वे भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और देश की रक्षा करने के लिए आज भी तैयार हैं। उन्होंने भी उस दिन को याद किया और बताया कि कैसे कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में भारत जीता।

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जब इन दोनों लोगों से ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बात की गई, तो उन्होंने अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा, मेरा देश और मेरी सेना हम लोगों के समय से काफी विकास किया है, जिसके कारण सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर दोनों सफल हुए। यह मेरे देश के लिए बड़े गौरव और प्रसन्नता की बात है। अब सेना में पहले से बहुत विकास हुआ है। उनके ये शब्द न केवल उनके अनुभव को दर्शाते हैं बल्कि भारतीय सेना की आधुनिक क्षमताओं पर उनके गर्व को भी रेखांकित करते हैं।
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