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स्वतंत्रता दिवस विशेष: आजादी के राष्ट्र नायकों के समागम का साक्षी है भदोही का बघेल भवन

Tue, 14 Aug 2018 03:06 PM IST
पंकज चौबे , अमर उजाला, भदोही
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बघेल छावनी - फोटो : अमर उजाला
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22 गांवों की जमींदारी के ठाठ और रसूख को देश के लिए हाशिए पर डाल देने की बानगी देखनी हो तो यूपी के भदोही आइए। गोपीगंज के जमींदार बघेल परिवार के वरिष्ठ सदस्य जंग बहादुर सिंह बघेल ने न केवल जंग-ए-आजादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, बल्कि 20 एकड़ से अधिक जमीन विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में दान में दे दी। देश की खातिर जमींदार होते हुए भी महीनों तक उन्होंने जेल की यातना भी झेली।    
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 स्वाधीनता संग्राम के दौरान जब कई राजे-रजवाड़े अंग्रेजों की हां में हां मिलाकर मलाई काट रहे थे, उस समय कुछ ऐसे राजशाही परिवार भी हुए, जिन्होंने अंग्रेजी दासता की मुखालफत में आवाज बुलंद की। गोपीगंज के जमींदार जंग बहादुर सिंह बघेल इसी की बानगी थे। गोपीगंज स्थित बघेल छावनी भवन आज भी जंग-ए-आजादी का साक्षी है।

यहां स्वाधीनता संग्राम के दौरान चोटी के तमाम नेताओं का जहां आगमन हुआ और आजादी की लड़ाई की रणनीति पर चर्चा हुई, वहीं जंग बहादुर सिंह बघेल की अगुवाई में इस परिवार के तीन सदस्यों ने जंग-ए-आजादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। गांधी जी के आंदोलन से प्रभावित होकर जंग बहादुर सिंह बघेल 30 के दशक में कांग्रेस के साथ होकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।
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जंग बहादुर सिंह बघेल गांधी जी के साबरमती आश्रम और महाराष्ट्र के वर्धा आश्रम में जाकर कई महीने तक रुके और आजादी की लड़ाई में योगदान किया। यहीं से उनकी गिरफ्तारी भी हुई। साथ में भतीजी कृष्णा और भतीजे हृदय नारायण सिंह बघेल ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी। 13 महीने तक दोनों लोगों ने जेल की सजा काटी। दोनों लोग चार महीने तक नैनी जेल में भी रहे।
 

बघेल छावनी में एक रात ठहरा था अवध का अंतिम नवाब

गुलाब सिंह बघेल - फोटो : अमर उजाला

इस दौरान हृदय नारायण सिंह बघेल फरार हो गए थे। उनके नाम अंग्रेजी सरकार ने फरारी वारंट जारी किया था। यही नहीं भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे जब बघेल छावनी आए तो उनके आंदोलन से प्रभावित होकर 20 एकड़ से अधिक जमीन उनके यज्ञ में दान कर दी।

दोनों क्रांतिकारियों (जंग बहादुर सिंह बघेल और हृदय नारायण सिंह बघेल) से व्यक्तिरूप से मिल चुके भदोही जिला निर्माण समिति के महामंत्री केशव कृपाल पांडेय बताते हैं कि गोपीगंज की बघेल छावनी का जिक्र अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने भी अपने सफरनामे में किया है। जब अंग्रेज उसे गिरफ्तार कर ले जा रहे थे, उस समय बघेल छावनी के गेस्ट हाउस में एक रात के लिए वाजिद अली शाह को ठहराया गया था।

उसने अपने सफरनामे में लिखा है- ‘रास्ते में मिला था गोपीगंज, जिसकी कीमत थी टोपी से भी कम।’ जंग बहादुर सिंह बघेल के भतीजे और वर्तमान में बघेल परिवार के बयोवृद्ध सदस्य गुलाब सिंह बघेल कहते हैं कि विदेशी कपड़ों की होली जलाने के मामले में दादा जी और बुआ गिरफ्तार कर जेल गए थे। बाल्यावस्था में मैं भी उन लोगों से मिलने के लिए नैनी जेल जाया करता था।   
 
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गोपीगंज में महफूज हैं बापू की अस्थियां

गोपीगंज बघेल छावनी में आ चुके हैं महात्मा गांधी - फोटो : अमर उजाला
आजादी की लड़ाई में भदोही जिले की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गोपीगंज के जमींदार बघेल परिवार की साबरमती और वर्धा आश्रम से घनिष्ठता के कारण वर्ष 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद उनकी अस्थियों का कुछ हिस्सा क्रांतिकारी जंग बहादुर सिंह बघेल भी अपने साथ ले आए थे।

गोपीगंज क्षेत्र के रामपुर कायस्थान गांव में आजादी के महानायक के अस्थि कलश को स्मारक के रूप में सहेजकर रखा गया है। यहां जंगबहादुर का एक आश्रम भी है, जहां भूदान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे समेत कई क्रांतिकारी आ चुके हैं। हालांकि उपेक्षा के प्रशासन की कारण स्मारक के साथ आश्रम खंडहर में तब्दील हो चुका है। 

साबरमती के जिस संत के पीछे समूचा देश आजादी की दीवानगी मन में पाले निकल पड़ा था, उसका भदोही जिले से गहरा नाता था। कम ही लोग जानते हैं कि महात्मा गांधी काशी नरेश के जमाने में गोपीगंज के जमींदार बघेल परिवार की बघेल छावनी के मेहमान बने थे। पं. जवाहर लाल नेहरू और विनोबा भावे जैसी विभूतियां भी बघेल छावनी की शोभा बढ़ा चुकी हैं।

गांधी युग में बघेल परिवार मान्यता प्राप्त जमींदार घराना था, जिसे काशी राज्य के राजाओं जैसा हक हासिल था। 1930 के दशक में जंग बहादुर सिंह बघेल आजादी के लिए महात्मा गांधी और कांग्रेस के साथ हो लिए। अपनी भतीजी कृष्णा सिंह को साथ लेकर वह स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करने लगे। इसमें उनके भतीजे हृदय नारायण सिंह ने भी साथ दिया।

जंग बहादुर सिंह बघेल और कृष्णा साबरमती व वर्धा आश्रम में जाकर महीनों तक रुके और आजादी की लड़ाई में योगदान किया। सन 1948 में जब राष्ट्रपिता चिर निद्रा में लीन हो गए तो अंतिम संस्कार के बाद उनकी अस्थियों को उनके कुछ नजदीकी लोगों में वितरित किया गया। जंग बहादुर सिंह बघेल ने यह कह कर गांधीजी की अस्थियां ग्रहण की कि महान विभूति की राख से गोपीगंज की धरती और पवित्र हो जाएगी। इसके बाद गोपीगंज क्षेत्र के रामपुर कायस्थान गांव में बघेल परिवार की ही जमीन में अस्थित कलश में रखकर उसे पक्के स्मारक का रूप दे दिया गया, जो प्रशासन की उपेक्षा के कारण इस बदहाल हो चला है।

जंगबहादुर के पोते और हृदयनारायण बघेल के पुत्र गुलाब सिंह बघेल बताते हैं कि दादा जी बापू के काफी नजदीकी थे। इलाहाबाद स्थित संगम में उनकी अस्थियों के विसर्जन के दौरान मैं भी बुआ जी (कृष्णा सिंह) के साथ गया था। मैं छोटा था, लेकिन वह दृश्य आज भी मुझे बखूबी याद है। उसी समय दादा जी बापू की अस्थियां लेकर यहां आए थे।
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