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आईआईटी बीएचयू का शोध छात्र लापता, कमरे से मिला मोबाइल और नोट

Fri, 24 Mar 2017 10:09 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
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आईआईटी बीएचयू - फोटो : file photo
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आईआईटी बीएचयू का शोध छात्र रामजी तोमर गुरुवार को रहस्यमय ढंग से लापता हो गया। देर शाम तक जब वो हॉस्टल नहीं लौटा तब उसके साथियों ने वार्डन को सूचना दी। देर रात ही मौके पर प्राक्टोरियल बोर्ड की टीम और पुलिस हॉस्टल पहुंची। खोजबीन के दौरान उसके कमरे से एक नोट मिला।
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इसमें उसने लिखा है कि वह अपनी मर्जी से जा रहा है, इसके लिए किसी को परेशान न किया जाए। हालांकि वह गया कहां, इस बारे में कुछ नहीं लिखा है। उसने अध्यात्म की तरफ झुकाव और ईश्वर को समर्पित होने की बात लिखी है। फिलहाल पुलिस मान रही है कि छात्र अपनी मर्जी से कहीं चला गया है।

उसका मोबाइल भी हॉस्टल के कमरे में ही है। हॉस्टल वार्डन ने लंका थाने में उसकी गुमशुदगी दर्ज कराई है। पुलिस उसकी कॉल रिकॉर्ड और दोस्तों से पूछताछ कर तफ्तीश में जुटी हुई है।
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बांदा जिले के खपतिहा कलां का रहने वाला रामजी तोमर आईआईटी बीएचयू के धातुकीय अभियांत्रिकी विभाग में शोध छात्र है। वह डॉ. सीवी रमन हॉस्टल के कमरा नंबर 200 में रहता है।

वह गुरुवार को दिन में करीब 11:30 बजे हॉस्टल से निकला था। जाने से पहले उसने अपनी मां को फोन किया था। मां खाना बना रही थीं। इसलिए रामजी ने उन्हें बाद में फोन करने को कहा। काफी देर तक जब रामजी का दोबारा फोन नहीं आया तो उसके पिता राम अवतार तोमर ने फोन किया लेकिन उसका फोन नहीं उठा।

शाम साढ़े सात बजे उन्होंने दोबारा फोन किया। तब भी फोन नहीं उठा। परेशान होकर उन्होंने उसके एक साथी को फोन किया और जब उसका दोस्त उसके रूम में पहुंचा तो रामजी वहां नहीं था। इसके बाद वार्डन और पुलिस को सूचना दी गई।

पुलिस ने हॉस्टल पहुंचकर कमरे की छानबीन की। वहां से उसका मोबाइल और एक नोट मिला जिसे पुलिस ने कब्जे में ले लिया है। सुबह रामजी के पिता राम अवतार सिंह और उसके बड़े भाई हॉस्टल पहुंचे। वार्डन डॉ. देबाशीष खान की तहरीर पर लंका थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई है।
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नोट में लिखा- ‘मेरा जीवन ईश्वर को समर्पित’

रामजी तोमर ने जो नोट हॉस्टल में छोड़ा है, उसमें धर्म और अध्यात्म से जुड़ी बातें उसने लिखी हैं। लिखा है- ‘मैं यह लिखते हुए हर्ष महसूस कर रहा हूं कि मैं यह जीवन अपने लिए जीने जा रहा हूं। यद्यपि मुझे इसके लिए लोग गलत कहेंगे तथापि यह सब मैं पूरे होशोहवास में कर रहा हूं।

यद्यपि यह जीवन मेरे माता-पिता का है फिर भी मेरे माता-पिता को गर्व महसूस होगा, जब मेरा ये जीवन ईश्वर के लिए समर्पित होगा। इस दुनिया की भागमभाग में यह देख लिया है कि बेफजूल का व्यवहार फैला हुआ है।’

रामजी ने अपने नोट में यह बात भी साफ की है कि उसके द्वारा उठाए गए इस कदम के लिए किसी दूसरे को परेशान न किया जाए। लिखा है कि ‘यह कागज मैं प्रशासन के लिए छोड़े जाता हूं कि कोई भी किसी को बेवजह परेशान न करे।’

उसने यह भी लिखा है कि ‘मुझे मेरे माता-पिता पर पूरा भरोसा है कि वह किसी पर भी कोई आरोप नहीं लगाएंगे, ना ही किसी को परेशान करेंगे।’ उसके पिता ने भी यह बात स्वीकारी है कि रामजी शुरू से ही बेहद धार्मिक प्रवृत्ति का था। उसका अध्यात्म की ओर झुकाव था। गांव के मंदिर के पुजारी से उसकी बहुत बनती थी। गांव में भी अपने हमउम्र लड़कों की बजाय बुजुर्गों से उसका लगाव था। 
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