अस्सी स्थित नगर निगम का पार्किंग स्टैंड। इसी स्थान पर कभी असि नदी बहती थी।
मैं असि हूं। मैं काशी की असि हूं। यहां लोग मोक्ष की कामना के साथ आते हैं कि उन्हें स्वर्ग मिलेगा। पर, मैं तोना जीने में हूं ना मरने में...।जीते जी नर्क भोग रही हूं। लोग मेरे अस्तित्व को ही नकारने में लगे हैं कि मैं नदी ही नहीं हूं नगवा नाला हूं। कभी मैं कलकल निनाद के साथ लहरों से खेलती-कूदती, इठलाती गंगा मैया की गोद में समा कर सुकून महसूस करती थी। पर, अब मेरे कंधे पर शहर भर के मलबे का इतना बोझ डाल दिया गया है कि हिम्मत ही नहीं रही कि कि गंगा मां के पास जाऊं...। तभी तो मेरी धारा को मोड़ कर नाले में डाल दिया गया। जिस असि और गंगा के संगम के मिलन को देखकर संत तुलसी दास हुलसते थे, मेरे किनारे पर बैठकर तप करते थे और राम चरित मानस लिखा करते थे अब वह संगम कहां...। निजी स्वार्थों के चलते मेरा मुंह मोड़ दिया, मेरा नाम ही बदल दिया। अब मैं दुख की गठरी बन गई हूं। कोई है जो मोक्ष दिला दे? एक बार फिर मैं लहरों के साथ गंगा मैया की छांव में जी सकूं?
जहां कभी असि-गंगा का मिलन होता था, वहां नगर निगम का सुलभ कॉम्पलेक्स और सड़क बना दी गई। असि संगम के हृदय स्थल को पाट कर निगम ने पार्किंग बना दी और राजकोष में इजाफा कर रहा है। यह वही असि-संगम तीर्थ है, जहां से काशी की तीन पौराणिक पापमोचनी यात्राएं आरंभ होती हैं। असि घाट से जुड़े लोगों का कहना है कि इस संगम को पुनर्जीवित किए बिना वाराणसी नाम की महिमा अधूरी रह जाएगी।
असि-गंगा संगम को पाटे जाने की घटना महज 28 साल पुरानी है। 1988 में गंगा निर्मलीकरण के तहत असि संगम को दुर्गंधयुक्त निष्प्रयोज्य नाला बताकर पाटा गया। जबकि वह नाला नहीं सनातनी आस्था का तीर्थ पाटा जा रहा था। एक संस्कृति दफनाई जा रही थी लेकिन इसके विरोध में किसी ने आवाज तक नहीं उठाई। जहां कभी असि-गंगा संगम था, वहां अब सुलभ कॉम्पलेक्स चलता है। बउरहवा बाबा का आश्रम उसी संगम की छाती पर तन गया है। इतना ही नहीं घाट जाने के लिए नदी के संगम तट को पाट कर सड़क बना दी गई है। उसी संगम के एक छोर पर नगर निगम ने कार पार्किंग खोल ली है। अरसा बीतने के बाद भी असि-गंगा संगम की याद लोगों के जेहनोदिल में बसी हुई है। अस्सी मुहल्ले के दीनानाथ शर्मा बताते हैं कि इस संगम में नाला बहाकर इसकी महिमा से खिलवाड़ किया गया। असि-गंगा संगम में स्नान के बाद असि संगमेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद काशी की पौराणिक तीर्थयात्राएं आरंभ होती रही हैं। अभी भी उन यात्राओं का मार्ग असि-संगमेश्वर धाम से ही होकर जाता है लेकिन संगम गुजरे जमाने की चीज हो गया।