यूपी के आजमगढ़ में एक ऐसा गांव है जहां पर हिंदू भी मोहर्रम मनाते हैं। इसके साथ ही हिंदू ताजिया भी निकालते हैं। गांव में यह परंपरा 250 वर्षों से चल रही है। यहां का ताजिया इतना मशहूर है कि लोग दूर-दूर से मोहर्रम पर ताजिए का जुलूस देखने आते हैं।
जिले में डोरवा गांव की चौहान बस्ती के लोग करीब 250 वर्षों से मोहर्रम मनाकर सांपद्रिायक सौहार्द की मिशाल पेश कर रहे हैं। बताते हैं कि यहां ताजिया बनाने के लिए चार सोने के झूमर और सोलह किग्रा चांदी की कलशी सिंगापुर से मंगाई गई थी, जो आज भी मौजूद है। ताजिया बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है।
ताजिया रखने के लिए इमामबाड़ा भी बनाया गया है। जहां 200 साल पुराना तंबू भी मौजूद है। जिसे रामदीन ने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर छह महीने में तैयार किया था। मोहर्रम के समय इसका प्रयोग किया जाता है। ताजिया पूरे क्षेत्र में घुमाया जाता है।
डोरवा के चौहान बस्ती और सुंदर सराय बल्लो के पठान लोगों के ताजिया का मिलन होता है। सुंदर सराय बल्लो स्थित कर्बला के मैदान में ताजिए को दफनाया जाता है। वहीं पर मोहर्रम के समय गांव के जितने भी लोग बाहर रोजगार के लिए गए होते हैं, वह भी घर आते हैं। प्रसाद के रुप के में मलीदा बनाकर वितरण किया जाता है। पूरे मोहर्रम ढोला ताशा बजाया जाता है। जिसमें बढ़ चढ़कर लोग भाग लेते हैं।