हिंदुस्तान की प्राणवायु है हमारी हिंदी
हिंदी हमारे समाज को जोड़ने का काम करती है। आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग हिंदी ही समझता और बोलता है। कहा जाए तो हिंदी हिंदुस्तान की प्राणवायु है। देश हो या विदेश हिंदी हमें अपनों से जोड़ने के लिए एक माध्यम है। विदेशों में भी हिंदी भाषा को बढ़ावा देने के लिए लोग कार्य कर रहे हैं। आज देश में मनोरंजन का सर्वाधिक प्रचलित साधन भारतीय फिल्में हैं। देश के हर कोने में हिंदी फिल्में देखी जाती हैं। हम कह सकते हैं कि हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है। कई देशों में भी हिंदी फिल्मों को देखने वाले बहुत सारे लोग हैं। - सतेंद्र सिंह, भोजपुरी अभिनेता
हिंदी माध्यम से शिक्षा ने दिलाया मुकाम
उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अंतर्गत हिंदी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर चयनित रत्नाकर दुबे कहते हैं कि हिंदी में भविष्य की भरमार है। वह कहते हैं, मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा हिंदी माध्यम से ली। आज उसी हिंदी ने मुझे सफलता की सीढ़ियों तक पहुंचाया है। सरकारी नौकरियों में हिंदी की मांग कम नहीं हुई है। जरूरत हिंदी को और जरूरी बनाने की है। हिंदी हमारी मातृभाषा है। हम इसमें सहज महसूस करते हैं और मनोभाव व्यक्त करते हैं। बापू ने कहा था, अपनी भाषा से दूर होकर कोई भी तरक्की स्थायी नहीं हो सकती। उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में 'अमर उजाला' की यह विशेष मुहिम निसंदेह सराहनीय है।
हमारी पीढ़ियों ने आजादी के बाद एक विदेशी भाषा पर आश्रित होकर उसे सीखने में जितनी ऊर्जा खर्च की है, उसे हम मौलिक भाषा के विकास में लगाते तो आज सूरत कुछ और होती। वैज्ञानिक रूप से खरी हिंदी भाषा का साहित्य बेहद समृद्ध है। मुझे गर्व है की मेरी अभिव्यक्ति और रोजगार की भाषा हिंदी है।
हिंदी हैं हम अभिनव अरुण।
- फोटो : अमर उजाला
भाषा के आकर्षण ने मुझे बांधा
भाषा के आकर्षण ने मुझे ऐसा बांधा कि नब्बे के दशक में अनायास ही मेरे कदम पत्रकारिता की ओर मुड़े और अनेक अखबारों में नौकरी और फीचर लेखन के साथ प्रसारण क्षेत्र में आ गया। इस भाषा ने मेरी पहचान बनाई और मुझमें अकूत आत्मविश्वास भरा। लेख, कहानियां, कविताएं और गजलें लिखते हुए मैंने इस भाषा से अपना असीम लगाव महसूस किया। मेरा प्रयास होता है कि अधिकाधिक लोगों के मन में हिंदी साहित्य और भाषा के प्रति लगाव को बढ़ाया जाय। इसी उद्देश्य से पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं के साथ साथ कवि सम्मेलनों और सोशल साइट्स पर भी मेरी सक्रियता है। यदि हम रेडियो, टेलीविजन और मीडिया के अन्य लोकप्रिय माध्यमों में भाषा के प्रति सतर्कता बरतें और इसे सरल बोधगम्य बनाए रखते हुए विकृतियों से परहेज करें तो नि:संदेह यह हिंदी की गरिमा वृद्धि में हमारा अमूल्य योगदान होगा। - अभिनव अरुण, आकाशवाणी वाराणसी के वरिष्ठ उद्घोषक और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सम्मानित साहित्यकार