एएसआई ने रिपोर्ट में खुलासा किया है कि पश्चिमी कक्ष की उत्तरी और दक्षिणी भुजा बनाता है। कक्ष की दक्षिणी भुजा को ग्रिल बाड़ से कुछ दूरी पहले तक पश्चिम की ओर खोजा जा सकता था। जगह की कमी और सुरक्षा जांच चौकी की मौजूदगी के कारण इसके पश्चिमी हिस्से का पता नहीं लगाया जा सका।
रिपोर्ट में ज्ञानवापी के 32 सच
- परिसर में मौजूद रहे विशाल मंदिर में बड़ा केंद्रीय कक्ष था। इसका प्रवेश द्वार पश्चिम से था, जिसे पत्थर की चिनाई से बंद किया है।
- केंद्रीय कक्ष के मुख्य प्रवेश द्वार को जानवरों व पक्षियों की नक्काशी और एक सजावटी तोरण से सजाया गया था।
- प्रवेश द्वार के ललाट बिंब पर बनी नक्काशी को काटा गया है। कुछ हिस्से को पत्थर, ईंट और गारे से ढक दिया गया है।
- तहखाने में उत्तर, दक्षिण और पश्चिम के तीन कक्षों के अवशेष को भी देखा जा सकता है पर कक्ष के अवशेष पूर्व दिशा और उससे भी आगे की ओर हैं। इसका विस्तार सुनिश्चित नहीं हो सका, क्योंकि पूर्व का क्षेत्र पत्थर के फर्श से ढका हुआ है।
- ज्ञानवापी परिसर में मौजूद मूर्तियों के अवशेष और बड़ी संख्या में हिंदू देवी देवताओं की प्रतिमा का संरक्षण है।
- इमारत में पहले से मौजूद संरचना पर उकेरी गई जानवरों की आकृतियां थीं। 17वीं सदी की मस्जिद के लिए ये ठीक नहीं थे, इसलिए इन्हें हटा दिया गया, पर अवशेष हैं।
- मस्जिद के विस्तार व स्तंभयुक्त बरामदे के निर्माण के लिए पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों जैसे खंभे, भित्तिस्तंभ आदि का उपयोग बहुत कम किया है, जिनका उपयोग किया है, उन्हें जरूरत के अनुसार बदला है।
- इमारत की पश्चिमी दीवार (पहले से मौजूद रहे मंदिर का शेष भाग) पत्थरों से बनी है और पूरी तरह सुसज्जित की गई है।
- उत्तर और दक्षिण हॉल के मेहराबदार प्रवेश द्वारों को अवरुद्ध कर दिया गया है और उन्हें हॉल में बदल दिया गया है। सर्वे के दौरान मिला शिलालेख, जो संस्कृत भाषा से मिलता-जुलता है।
- उत्तर दिशा के प्रवेश द्वार पर छत की ओर जाने के लिए बनी सीढ़ियां आज भी प्रयोग में हैं। जबकि छत की ओर जाने वाले दक्षिण प्रवेश द्वार को पत्थर से बंद किया गया है।
- किसी भी इमारत की कला व वास्तुकला न केवल उसकी तारीख बल्कि उसके स्वभाव का भी संकेत देती है। केंद्रीय कक्ष का कर्ण-रथ और प्रति-रथ पश्चिम दिशा के दोनों ओर दिखाई देता है।
- सबसे महत्वपूर्ण चिह्न ‘स्वस्तिक’ है। एक अन्य बड़ा प्रतीक शिव का ‘त्रिशूल’ है। श्रीराम और शिव लिखी शिला।