अदालत ने रामकुमार जायसवाल, रंजना अग्निहोत्री, आशीष तिवारी और पवन कुमार की तरफ से पक्षकार बनने के लिए दिए गए दो आवेदनों को स्वीकार कर लिया। वहीं, रमेश उपाध्याय, सत्यप्रकाश श्रीवास्तव, सतीश अग्रहरी व रमेश उपाध्याय, सुनीता श्रीवास्तव, संजय कुमार और महंत गोविंद दास शास्त्री की तरफ से पक्षकार बनने के लिए दिए गए छह आवेदन निरस्त कर दिए गए हैं।
अदालत में वादी मुख्तार अहमद की ओर से अधिवक्ता नंदलाल ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि यह वाद आराजी नंबर 9130 ज्ञानवापी मस्जिद के अंदर स्थित तीन मजार पर उर्स का आयोजन करने व अन्य धार्मिक क्रियाकलाप हेतु दाखिल किया गया है। वादग्रस्त संपत्ति का फसली वर्ष 1291 का खसरा दाखिल किया गया है। यह वाराणसी जनपद स्थित वक्फ नंबर 100 है।
यह वाद इस्लाम धर्म के अनुसार रीतिरिवाज व धार्मिक अधिकार हेतु दाखिल किया गया है। तृतीय पक्षकार हिंदुओं ने आवेदन मुकदमे को लंबित रखने के उद्देश्य से दिया है। वाद पत्र में वर्णित ज्ञानवापी की सुरक्षा व देखरेख का इंतजाम सरकारी खर्चे पर किया जाता है और परिसर बैरीकेडिंग से घिरा है। उसके अंदर 5 वक्त की नमाज अदा की जाती है। इसकी देखरेख अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी प्रबंधन करती है।
अदालत में तृतीय पक्षकार हिंदुओं की ओर से अधिवक्ता हरिशंकर जैन, सुभाष नंदन चतुर्वेदी, सुधीर त्रिपाठी और दीपक सिंह ने दलीलें पेश की। उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी स्थित आराजी नंबर 9130 पर 350 वर्ष पहले औरंगजेब के शासनकाल में भगवान विश्वेश्वर के मंदिर को तोड़ा गया। उस पर मस्जिद के ढांचे का निर्माण किया गया था। जबकि संपूर्ण संपत्ति भगवान आदि विश्वेश्वर में अनादि काल से निहित है।a
विधि अनुसार जब एक बार कोई संपत्ति देवता में निहित हो जाती है तो उसका स्वत्व परिवर्तित नहीं किया जा सकता। वर्तमान में यह संपत्ति भगवान आदि विश्वेश्वर में निहित है। तृतीय पक्षकार व समस्त हिंदू समुदाय भगवान शिव सहित अन्य देवताओं के उपासक हैं। इस वाद में किसी हिंदू को हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए पक्षकार नहीं बनाया गया है। ऐसे में हिंदूू पक्ष को सुने बिना वाद का सम्यक निस्तारण संभव नहीं है।