पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर महंत बालक दास का कहना है कि मानस ने शैव और वैष्णव के बीच की दूरियों को खत्म कर दिया। मानस की ही देन है कि आज राम और शिव के भक्तों के बीच की खाई भर गई है। पहले लोग सोचते थे कि शिव और राम अलग-अलग हैं लेकिन गोस्वामी जी ने मानस की रचना से इस संदेह को खत्म कर दिया। अवध में भले ही मानस की रचना शुरू हुई लेकिन मान्यता तो इसे काशी में ही मिली।
गोस्वामी तुलसीदास ने जब मानस की रचना पूर्ण कर ली तो काशी में संस्कृत के विद्वानों ने विरोध किया। तय हुआ कि इसको प्रमाणित कैसे किया जाए। इसके लिए सभी ने बाबा विश्वनाथ की शरण ली। मंदिर के गर्भगृह में सभी ग्रंथों के नीचे रामचरित मानस की पांडुलिपि को रखा गया। इसके बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए। सुबह जब कपाट खुले तो मानस सबसे ऊपर थी। उसके ऊपर भगवान शिव के हस्ताक्षर थे और सत्यम शिवम सुंदरम अंकित था।
गोस्वामी तुलसीदास ने युग को मर्यादा पुरुषोत्तम राम दिए। रामचरित मानस में आदर्श जीवन के संदेश के साथ ही तुलसीदास ने रामभक्त हनुमान को भी जन जन तक पहुंचाया। संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र का कहना है कि तुलसीघाट का पूरा क्षेत्र चहुंदिश हनुमतमय है। आवास प्रांगण में तुलसी ने हनुमत प्रभु की दक्षिणाभिमुख मूर्ति सजाई। बाद में अखाड़ा तुलसीदास के महंतों ने पूर्वाभिमुख, पश्चिमाभिमुख व उत्तराभिमुख हनुमान की मूर्तियां स्थापित कीं। माना जाता है कि बजरंगबली यहां से चारों दिशाओं पर नजर रखते हैं।