जल्द ही होगा चाैथा रिसर्च
इंडोनेशियाई लोगों का डीएनए वर्तमान में अंडमान-निकोबार के आदिवासियों और सिंधु घाटी सभ्यता के निवासियों में भी मिला है। प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और एस्टोनिया के तार्तू विवि के वैज्ञानिकों ने इन संबंधों के अध्ययन के लिए कुल तीन शोध किए हैं। ये रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर के साइंटिफिक रिपोर्ट, नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन और ह्यूमन बायोलॉजी में प्रकाशित हो चुके हैं। जल्द ही चौथा रिसर्च पेपर प्रकाशित होने वाला है।
जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि राष्ट्रपति प्राबोओ सुबियांतो के ऐसा कहने की तीन वजहें हो सकती हैं। पहला उनका वाई क्रोमोसोम भारत का हो सकता है।
दूसरा उनका माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए भारतीय हो सकता है और तीसरा उनका 30 फीसदी डीएनए भारत का हो सकता है। प्रो. चौबे ने कहा कि इसमें वाई क्रोमोसोम का अर्थ है कि उनका पैतृक डीएनए भारत का होगा। मातृत्व वाला डीएनए भारत का होगा। ऑटोसोम डीएनए 30 प्रतिशत के आसपास होगा।
बीएचयू में हुआ रिसर्च।
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अफ्रीका से भारत के रास्ते इंडोनेशिया पहुंचे थे आदि मानव
बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि अंडमान द्वीप के जारवा, ओंगे और ग्रेट अंडमानी आदिवासियों का एम-31 और एम-32 डीएनए, निकोबार का आर-22, वहीं सिंधु घाटी सभ्यता का यू-टू-बी डीएनए इंडोनेशिया की सौ फीसदी आबादी के डीएनए में लगभग 30 फीसदी तक पाया गया है।
70 हजार साल पहले अफ्रीका से निकले आदि मानव भारत और इंडोनेशिया के रास्ते ऑस्ट्रेलिया पहुंचे थे। काफी वर्षों तक भारत में रहे। इसलिए इंडोनेशिया और भारत के लोगों में एक माइटोक्रॉन्ड्रियल संबंध बना हुआ है।
वहीं, भारत से ऑस्ट्रेलिया के बीच ये लोग अंडमान के रास्ते गए थे। अंडमान के जारवा, ओंगे और ग्रेट अंडमानिज आदिवासियों को इंडोनेशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ पूरे चीन की आबादी का जीवित पूर्वज कहा जाता है।