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घन आए घनश्याम न आए झिंगुरवा बोले छूम छनन छन

Thu, 07 Jul 2016 02:20 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
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पं. साजन मिश्र
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मियां की मल्हार पर तानसेन के सुर लगाने से कभी बादलों के गरजने-बरसने की आपने अब तक सिर्फ दंतकथा सुनी होगी लेकिन आज इस सच से रूबरू हो लीजिए। पद्मभूषण पं. साजन मिश्र कहते हैं कि मल्हार सचमुच बरसता है लेकिन इसके लिए स्वरों में जान और सांसों में दमकशी होनी चाहिए।
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वह अपने जीवन से जुड़े अनुभवों को याद करते हुए कहते हैं कि मल्हार बाहर से भले न भिगोए लेकिन भीतर से बारिश का एहसास करा देता है। 1999 में अहमदाबाद में स्पिक मैके की संगीत संध्या के दौरान ऐसा की एक वाकया हुआ था जो उन्हें कभी भुलाए नहीं भूलता। वह बताते हैं कि मार्च का महीना था। डेढ़ घंटे तक चली संगीत महफिल के दौरान पीछे बैठे संगीत प्रेमियों के बीच से आवाज आई कि- पंडित जी,  मेघ गा दें तो बड़ी कृपा होगी। बड़े भाई पद्मभूषण पं. राजन मिश्र ने कहा कि यह महीना कोई मेघ गाने का है? कोई दूसरा राग पसंद हो तो बताइए लेकिन कुछ युवा मेघ मल्हार की बंदिश गाने की जिद करने लगे। अंतत: मल्हार की बंदिश पर हम लोगों ने आलाप शुरू किया। बोल थे- बादर की धमक सुनी जब से कानन/तब से जियरा एक छिन नहिं धरत धीरवा...। उसी संगीत निशा में जानी मानी सितार वादिका संजू मेहता के घर से उनकी दोनों भाभियां भवानी और रेशमा भी आई हुई थीं।


मल्हार की बंदिश खत्म होने के बाद दोनों एक-दूसरे से चिंता जताने लगीं कि बाहर इतनी बारिश हो रही है। कार पार्किंग से निकलेगी कैसे? आज तो हम लोग फंस गए। देखो बादल कितना गरज-बरस रहा है लेकिन बाहर निकले तो मौसम  साफ था। दोनों मेरे पास आईं और बताने लगीं कि हम जोरदार बारिश के एहसास में डूब गए थे। इसी तरह वह मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुए मल्हार महोत्सव की दूसरी घटना का वह जिक्र करते हैं।  उन दिनों आषाढ़ में एक बूंद बारिश नहीं हुई थी। हमने गौड़ मल्हार की बंदिश-घन आए घनश्याम न आए... मोर, पपीहा बोलन लागे...। चलत पुरवाई थर थर कांपे/मनवा लरजे/झिंगुर बोले छूम छनन नन...। फिर तानपूरे पर स्वरों को मिलाकर वह अपने गुरु बड़े रामदास जी की बनाई रचना सूरदासी मल्हार की बंदिश गाने लगते हैं-चमकन लागी रे बिजुरिया/ मोरवा बोले कोयल कूंके रे/श्याम पिया अजहूं नहिं आए...।
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