रिंग रोड, विशाल स्वर्वेद मंदिर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम काशीवासियों के लिए नया है। लहरतारा में महान संत कबीर की जन्म स्थली की पहचान भी अब दूर से ही हो जाती है। आज दिख रहा विशाल और भव्य मंदिर तब नहीं था।
सीरगोवर्धन पुर में संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर में स्वर्ण गुंबद, सोने की पालकी और स्वर्ण जड़ित प्रवेश द्वार ने काशी में बिना भेदभाव वाला बेगमपुरा बसा दिया। पूरे साल देश-दुनिया के लाख-लाख अनुयायियों की यात्रा से यह काशी के एक नए तीर्थ का सूर्योदय जैसा आभास कराता है। जैसे बुद्ध, रैदास, कबीर और तुलसी की इस प्राचीनतम पुरी में वैचारिक गोष्ठियों का आकार सिकुड़ा है लेकिन एकेडमिक्स में।
अब यहां वैसी मंडलियां नहीं दिखती हैं जहां सभी धर्मावलंबी संत महात्मा एक साथ मंच साझा करते हों। हां, अड़ियों से मनन प्रकटन की स्वतंत्रता तो काशी के देह और आत्मा में अभी बसी है। काशी में बहुजन वैचारिकी और आंबेडकरवादी आवाजों की सक्रियता इन 25 वर्षों में बहुत बढ़ी। काशी को थोड़ा और खोजने की जरूरत है। पार्श्वनाथ विद्यापीठ जो श्रमण परंपरा में जैन अध्ययन का सारवान केंद्र है, की चर्चा बहुत कम होती है। सारनाथ के अनागारिक धम्मपाल की ओर से 1891 में स्थापित महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया भी आज कहां गुम है कोई नहीं जानता।