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Ganga River: अस्सी से तुलसी घाट तक टीले जैसी मिट्टी और मलबे, जहां स्नान वहीं बदबू; 1.21 मिलीग्राम अमोनियम

Tue, 26 May 2026 10:24 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी में गंगा दशहरा पर अस्सी से तुलसी घाट तक गंगा किनारे मिट्टी और मलबे के ढेर लगे रहे। श्रद्धालुओं को स्नान के दौरान बदबू का सामना करना पड़ा। जांच में एक लीटर सीवेज में 1.21 मिलीग्राम अमोनियम आयन मिलने की पुष्टि हुई है। इससे गंगा जल की गुणवत्ता और सफाई व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।
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दशाश्वमेध घाट पर गंगा में फैली गंदगी के बीच स्नान करते श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Ganga River Varanasi: बीएचयू के वैज्ञानिकों और रिसर्च लैब ने भी माना है कि गंगा में गंदगी से निजात अभी नहीं मिलने वाली। अस्सी घाट पर गंगा दशहरा के सजे मंच से लेकर तुलसी घाट तक दिख जाएगा। मगर वहां तक गंदगी भी दिखेगी। 

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सोमवार को अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि अस्सी से तुलसी घाट के किनारे फूल-माला व निर्माल्य फेंके हुए हैं। बीच-बीच में मिट्टी के टीले, कूड़ों के ढेर और मलबा पटा हुआ है। बीच-बीच में छोटी नालियों से गंदे पानी के साथ प्लास्टिक भी बह रहा था। तुलसी घाट पर जहां लोग स्नान कर रहे थे, वहीं पेशाब की बदबू और कई तरह की गंदगियों का अंबार लगा था। 

बीएचयू के पर्यावरणविद और वैज्ञानिक रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. कृपा राम की ओर से किए गए शोध में सामने आया है कि सीवेज के नमूनों और नालियों में बाइकार्बोनेट, सल्फेट, नाइट्रेट और फॉस्फेट आयनों की मात्रा काफी ज्यादा पाई गई है। 
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नदी में प्रदूषकों का स्तर बढ़ गया। वहीं, हानिकारक अमोनियम आयन (1.21 मिलीग्राम/लीटर) सिर्फ सीवेज में ही पाया गया है। जबकि सल्फेट, नाइट्रेट और फॉस्फेट आयनों के उच्च स्तर के चलते नदी में शैवाल बढ़ रहे हैं पानी की गुणवत्ता खराब हो रही है। अध्ययनों से पता चला है कि बढ़ते शहरीकरण और बिना ट्रीट किए हुए सीवेज और नालियों के सीधे गंगा में मिलने से सबसे ज्यादा प्रदूषण बढ़ा है।

गंगा की बीओडी 4, वरुणा में 56 मिलीग्राम प्रति लीटर
गंगा के पानी का बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) तीन के आसपास संतुलित होता है। इस महीने में अस्सी घाट के आसपास गंगा का बीओडी चार मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया है। जबकि राजेंद्र प्रसाद घाट पर बीओडी 3.6 मिलीग्राम प्रति लीटर है। वहीं, वरुणा नदी में 56 मिलीग्राम प्रति लीटर है। गंगा में डीओ यानी कि डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन की मात्रा 7 मिलीग्राम प्रति लीटर है। वरुणा नदी में 1.6 मिलीग्राम प्रति लीटर है। गंगा का तापमान 29 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा है।

आईआईटी में फ्रांस और डेनमार्क की तकनीक से सफाई
आईआईटी बीएचयू में फ्रांस और डेनमार्क की तकनीक से गंगा लैब और एसएलआर स्मार्ट लैबोटरी ऑन क्लीन रिवर के कुल चार प्रोजेक्ट चल रहे हैं। 2026 में दो खत्म होंगे और बाकी 2027 तक चलेंगे। अस्सी में वाटर ट्रीटमेंट का प्रोजेक्ट पूरा हो गया है। इसके चलते गंगा में सीधे पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। आईआईटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्रोजेक्ट के चलते गंगा की स्वच्छता में काफी सुधार आया है।
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5 करोड़ लीटर गंदा पानी रोज जा रहा गंगा में, 40 साल में 4500 करोड़ खर्च
40 साल में सफाई के नाम पर 4500 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी काशी की गंगा में रोज पांच करोड़ लीटर गंदा पानी जा  रहा है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 542 के मुकाबले 492 एमएलडी गंदे पानी का शोधन एसटीपी के माध्यम से हो रहा है।  

जल निगम और क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अनुसार वर्ष 2017 तक वाराणसी में एसटीपी की शोधन क्षमता मात्र 100 एमएलडी थी जो कि वर्तमान में 492 एमएलडी हो गई है। क्षमता वृद्धि से पानी की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। वरुणा, असि और गोमती को प्रदूषण मुक्त किया जा रहा है।  2014 में शुरू किए गए नमामि गंगे कार्यक्रम में जिले में 200 एमएलडी क्षमता के एसटीपी स्थापित हुए हैं। 

जेएनएनयूआरएम के तहत 120 एमएलडी क्षमता का एसटीपी गोइठहां में संचालित है।  वर्ष 2022 के पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वाराणसी में गंगा नदी को प्राथमिकता खंड फोर में रखा था। इसे अब हटाकर प्राथमिकता खंड फाइव में कर दिया है। प्राथमिकता खंड फोर में बीओडी की मात्रा 6-10 पीपीएम होती है। प्राथमिकता खंड फाइव में बीओडी की मात्रा 3-6 पीपीएम होती है। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई जलनिगम के अधिशासी अभियंता एके सिंह ने कहा कि गंगा की सफाई पर बहुत काम हुआ है।
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