वरुणा+असि=वाराणसी। भगवान विष्णु के दाहिने चरण से पापमोचनी असि और बाएं चरण से वरुणा निकलीं हैं। इन्हीं दोनों नदियों के नाम पर दुनिया की प्राचीनतम नगरी वाराणसी बसी है लेकिन वरुणा जहां अस्तित्व के संकट से जूझ रही है, वहीं नदी सुधार की योजना के बहाने असि को मृतप्राय बना दिया गया है। उप्र जल निगम की गंगा प्रदूषण इकाई द्वारा असि की तलहटी में इंटरसेप्टर बिछाकर धन की बंदरबांट की जा चुकी है। अब वरुणा के किनारों की कटान रोकने के लिए करोड़ों रुपये की लागत से जियो टेक्सटाइल सीट बिछाने की योजना बनाई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों के मूल स्वभाव के विपरीत लागू की जाने वाली सुधार योजनाएं धन की बंदरबांट के अलावा कोई नतीजा नहीं दे सकती हैं।
संवत सोलह सौ असी असि गंग के तीर/ श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर...। संत तुलसीदास की तपस्थली असि-गंग के तीर...के मायने काशी में अब खत्म हो चुके हैं। असि-गंगा संगम को पाट कर मकान, दुकानें, घाट और सीढ़ियां बना दी गई हैं। नदी की तलहटी में अतिक्रमण कर मनमाने ढंग से रिहायशी कॉलोनियां और आलीशान मकान बनवा लिए गए हैं। यही नहीं, नदी सुधार के नाम पर बनाई गई योजना का कोई नतीजा तो नहीं निकला, अलबत्ता सरकारी विभागों ने करोड़ों रुपये हजम कर लिए हैं। यह सब तब हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गंगा और उसकी सहायक नदियों का हालात पर चिंता जताने के साथ-साथ इन नदियों के कायाकल्प और पुनरोद्धार का संकल्प ले चुके थे।
वरुणा और असि दो नदियों को मिलाकर ही इस प्राचीन नगरी का नाम वाराणसी पड़ा है। अब काशी की पहचान से जुड़ी दोनों ही नदियां अस्तित्व खोने के कगार पर हैं। दोनों नदियों में नगर निगम की सीवर लाइनें तो जोड़ी ही गई हैं, नाले भी बहाए जा रहे हैं। कर्दमेश्वर महादेव स्थित कंदवा तालाब से निकली यह नदी कंचनपुर, भिखारीपुर, बृज इंक्लेव, साकेतनगर, संकटमोचन होते हुए अस्सी मुहल्ले से होकर गंगा में मिलती है। करीब तीन दशक पहले तक अस्सी घाट पर ही असि-गंगा का संगम होता था। इसी असि-गंगा संगम तीर्थ पर संत तुलसी के साधनारत रहने के प्रमाण मिलते हैं।
अस्सी मुहल्ले के दीनानाथ शर्मा, त्रिलोकी नाथ शुक्ला, पं. नारायण गुरु बताते हैं कि उनके होश संभालने तक असि गंग के तीर... की महिमा साकार होती थी। इसी तीर्थ पर असि-संगमेश्वर महादेव का मंदिर फिलहाल आबाद है लेकिन असि-गंगा संगम को पाटकर वहां नई दुनिया बसा दी गई है। अब नदी के आठ किमी लंबे दायरे में बसी सघन कॉलोनियों का गंदा पानी नाले के रूप में इस नदी के पेटे से होकर नगवा के पास गंगा में बहा दिया जा रहा है। असि नदी के मरने का सिला क्या होगा, यह तो भगवान जाने लेकिन काशीवासियों के मन में टीस अभी से उठने लगी है।
साझा संस्कृति मंच के बैनर तले वल्लभाचार्य पांडेय, नंदलाल मास्टर, कपींद्र मिश्र ने कई बार पदयात्राएं निकालीं और हस्ताक्षर अभियान भी चलाया लेकिन हर बार उनकी सुनी नहीं गई। इतना ही नहीं, कड़े जन विरोध के बावजूद दो वर्ष पहले 87 करोड़ रुपये की लागत से इंटरसेप्टर (अंडरग्राउंड सीवर लाइन) बिछाकर असि नदी की आठ किमी लंबी तलहटी पाट दी गई है। नतीजा, इंटरसेप्टर बनने के बावजूद कॉलोनियों का गंदा पानी जस का तस असि नदी में ही बह रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी ही भी जान लें सरकारी बजट पर असि नदी को पाटने का काम उप्र जल निगम की गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के अफसरों ने उस समय ठेके पर तब कराया, जब नदियों के पुनर्जीवन की चिंता पूरे देश में बहस का मुद्दा थी।