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विघ्नहर्ता को विदा कर की कोरोना से मुक्ति की प्रार्थना

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वाराणसी। प्रत्येक वर्ष अनंत चतुर्दशी पर बप्पा के पिता शिव की नगरी में हर तरफ सुनाई देने वाले गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आना... का जयघोष इस पर सुनाई नहीं दिया। लोगों ने अपने अपने घरों में कुंड बनाकर ही गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया। 11 दिनों तक घरों में मिट्टी की बनी गणेश प्रतिमाओं का सुबह और शाम पूजा किया गया और भोग लगाया गया। वहीं मराठी समाज के लोगों ने इस बार बप्पा का विसर्जन नहीं किया। समाज अब अगले साल प्रतिमाओं का विसर्जन करेगा।
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कोरोना वायरस के कारण इस बार शहर के चौराहों और गलियों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई। इसके स्थान पर घरों में ही मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित की गई। सरकारी गाइडलाइन के अनुसार इस बार गणपति महोत्सव घरों में ही परिवार जनों तक सीमित रहा।
पंचामृत से अभिषेक साथ मोदक का भोग
गणेश मंदिरों में पुजारियों की तरफ से सुबह गणेश प्रतिमाओं का पंचामृत से अभिषेक करने के साथ मोदक का भोग भी लगाया गया। हालांकि मंदिरों के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद ही रखे गए चुनिंदा पुजारियों ने ही क्रिया को संपन्न कराया।
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मिट्टी की प्रतिमा का घर में किया विसर्जन
सुंदरपुर निवासी सार्थक नेने के घर में मिट्टी के इको फ्रेंडली बप्पा विराजे थे। बप्पा को विदा करते हुए परिवार का हर सदस्य भावुक था। सब ने बप्पा से यही कामना की कि अगले बरस वह जल्दी आए।
टब मैं कुंड बनाकर किया विसर्जन
दुर्गाकुंड निवासी ऋचा ने बप्पा के विसर्जन के लिए टब को कुंड बनाकर उसमें बप्पा का विसर्जन कर उनको विदा किया। सबने यहीं प्रार्थना की कि जल्द ही कोरोना खत्म हो और अगले साल दोगुने उत्साह के साथ उनका स्वागत करें।
अगले बरस तू जल्दी आना
ब्रिज एनक्लेव कॉलोनी निवासी पदमा गोरे के घर में इस 10 दिनों तक खूब रौनक थी। बप्पा परिवार के सदस्य की तरह विराजे हुए थे। आज उनके विदाई के समय सभी की आंखें नम थीं और होठों पर यही प्रार्थना थी कि अगले बरस तू जल्दी आना।
यादों के साथ विदा हुए बप्पा-
पांडेपुर निवासी अभिषेक गुप्ता बताते हैं कि सालों से शहर में गणेश उत्सव का साक्षी बनता आ रहा हूं। मेरे घर में भी पिछले 6 सालों से बप्पा विराज रहे हैं। काशी में बचपन में गणेश उत्सव देखते आ रहा हूं, तब यह उत्सव बिल्कुल ही अलग तरह से मनाया जाता था। श्रद्धा और उल्लास तो ऐसा ही रहता था, लेकिन अब के जैसी भव्यता और चकाचौध नहीं रहती थी। लोग सादगी से मंदिरों के साथ घरों के मंदिरों में भी गणेश जी की स्थापना करते थे। 10 दिनों तक पूरे शहर में रौनक और उत्साह का नजारा होता था। पंडालों में भव्य प्रतिमाओं का दर्शन कर मन अभिभूत हो जाता था ।
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